<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487</id><updated>2012-01-10T03:28:14.184+05:30</updated><category term='childhood'/><category term='टी-शर्ट'/><category term='गांधीनगर'/><category term='इंदौर'/><category term='पितृ पर्वत'/><category term='मेरा गाँव'/><category term='स्कूल'/><category term='जॉब'/><category term='यात्रा'/><category term='शौचालय'/><category term='होली'/><category term='टीआई'/><category term='स्लैमबुक'/><category term='बच्चा'/><category term='मैं'/><category term='स्वर्ग'/><category term='वेबदुनिया'/><category term='तोतली जुबान'/><category term='जिन्दगी'/><category term='indore'/><category term='माँ'/><category term='दोस्त'/><category term='पिता'/><category term='kulwant happy'/><category term='स्कूल के दिन'/><category term='युवा सोच युवा खयालात'/><category term='श्राद्ध'/><category term='railway satation'/><category term='रिश्वत'/><category term='जब प्यार हुआ मुझे'/><category term='भतीजी'/><category term='प्रेम कहानी'/><category term='friend'/><category term='मित्र'/><category term='नाड़ी निरीक्षण'/><category term='रतिया'/><category term='मेरी बेटी'/><title type='text'>खुली खिड़की</title><subtitle type='html'>मेरी जिन्दगी के कुछ लम्हें</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>39</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4512766033295178662</id><published>2011-06-02T12:42:00.000+05:30</published><updated>2011-06-02T12:42:27.144+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गांधीनगर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जॉब'/><title type='text'>जॉब छोड़ने के एक साल बाद</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आज हर कोई पैसा कमाना चाहता है, वो भी इतना कि वह अपने सपनों को साकार कर सके, लेकिन हिन्‍दुस्‍तान में नौकरी व्‍यवस्‍था ऐसी है कि वह आपको अमीर बनने भी नहीं देती और भूखा मरने भी नहीं देती। ऐसे में लाजमी है कि हर व्‍यक्‍ित ऐसा अवसर ढूंढता है जहां से वह अपने सपनों को साकार करने लायक आमदन कमा सके। मैं भी उन लोगों में ही शामिल हुं, लेकिन पैसा कमाने के लिए उस रास्‍ते पर कभी नहीं चलता, जिसके लिए मेरी आत्‍मा मुझे आज्ञा नहीं देती। आप सभी की तरह मेरी आंखों में भी सपने हैं, और उन सपनों को साकार करने की शक्‍ित, जो मुझे ईश्‍वर की ओर से तोहफे में मिली है, मुझे भगवान ने वार्निग डिजायर का गुण बख्‍शा हुआ है, जो बच्‍चों में होता है। वो अपनी हठ पूरी करने के लिए मां बाप को मजबूर कर देते हैं, और मेरे हिसाब से यह सारी सृष्‍टि मानव के लिए मां बाप से कम नहीं। जिन जिन लोगों ने वर्निंग डिजायर की, सृष्‍टि ने तथास्‍तु कहते हुए उसको पूरा किया, चाहे वो वॉल्‍ट डिजनी हो या फिर बिल गेट्स। मेरी बचपन से इच्‍छा थी, कोई ऐसा बिजनस करूं, जिससे में कुछ लोगों की जिन्‍दगियां बदल सकूं, और जो प्‍यार दुनिया ने मुझे दिया उसका कुछ कर्ज अदा कर सकूं। मुझे याद है, इस बिजनस के मिलने से एक साल पहले मैंने एक बेहतरीन जॉब को छोड़ते हुए जॉब खोने का मलाल करने की बजाय, कंपनी अधिकारियों के सामने कुछ शब्‍द कहे थे, जो आज आपके सामने कहने जा रहा हूं, मुझे लेखक बनना है और मुझे एक बेहतरीन जिन्‍दगी जीनी है, और मुझे आम आदमी की मौत नहीं मरना, मैं खुद का बिजनस खड़ा करूंगा और भारत के तीन शहरों में से किसी एक में रहना पसंद करूंगा, चंडीगढ़, दून और गांधीनगर। मैं जॉब छोड़ने के बाद पंजाब चला गया था, लेकिन उन शब्‍दों को कुदरत ने चुपके से सुन लिया था, और एक साल पूरा होने से पहले कुदरत ने मुझे गांधीनगर में भेज दिया एक नए बिजनस के साथ। उन शब्‍दों के मुताबिक ईश्‍वर ने मुझे बिजनस और शहर दे दिया, असल में कहूं तो एक बेहतरीन जिन्‍दगी जीने का एक सुनहरा अवसर, अब मैं इस अवसर को घोषणा नहीं चाहता, इस लिए एक साल पहले कहे हुए शब्‍दों को याद करते हुए मैंने अपने एक और सपने को साकार करने की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिए, जी हां, लेखक बनने की ओर। जब कुदरत मेरा साथ दे रही है तो मुझे कोशिश करने में क्‍या गुरेज है। मैंने किताब लिखने के लिए भी प्रयत्‍न करने शुरू कर दिए, एक बेहतरीन बुक लिखने के लिए, मैं घोषणा कर रहा हूं कि मैं किताब लिख रहा हूं, जैसे ही घोषणा की तो एक दोस्‍त ने सुन लिया और कहा, इतना उत्‍साह अच्‍छा नहीं होता, तुम असफल हुए तो लोग हंसेंगे, मैंने कहा, अगर असफन न हुए तो, सफलता के लिए तालियां भी तो यही बजाएंगे। उसने फिर रोका, लेकिन मैंने अब उसकी बात को चुनौती के रूप में ले लिया, और काम को तेज कर दिया। मैं सोचता हूं, हम घोषणाएं करने से क्‍यों डरते हैं, हमको घोषणाएं करनी चाहिए, जैसे कुछ फिल्‍म निर्देशक फिल्‍मों की घोषणाएं करते हैं, और वो फिल्‍में अधर में अटक जाती हैं क्‍या वह निर्देशक फिल्‍में बनाना बंद कर देते हैं, नहीं, वह अगले प्रोजेक्‍ट पर काम करना शुरू कर देते हैं, जब समय अच्‍छा होने लगता है तो पुरानी घोषणाओं को पूरा कर देते हैं। मैं नए बिजनस और अपनी घोषणाओं के साथ गांधीनगर गुजरात शिफट हो चुका हूं, उम्‍मीद है कि एक बेहतरीन जीवन जीकर इस दुनिया से विदा लूंगा। बाकी बातें बाद में दोस्‍तों फिर मिलेंगे। घोषणाएं करो, याद रखो कोई सुन रहा है।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4512766033295178662?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4512766033295178662/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4512766033295178662&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4512766033295178662'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4512766033295178662'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='जॉब छोड़ने के एक साल बाद'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-1178737145111089861</id><published>2011-03-27T15:32:00.000+05:30</published><updated>2011-03-27T15:32:56.977+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='यात्रा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>रास्ते में राधिका मिल गई</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लम्‍बे समय के बाद फिर से खुली खिडक़ी पर लौटा हूं। मुझे पता है कि आपको लोगों को मेरी अगली किश्त का इंतजार नहीं रहता, क्‍योंकि न तो मैं चेतन भगत हूं और न बिग अड्डा का अमिताभ बच्चन, एक साधारण भारतीय हूं, और कुछ लोगों की तरह मुझे भी डायरी लिखने का शौक है, पर सार्वजनिक रूप में, निजी नहीं। आज की किश्त में एक रेल यात्रा के बारे में बताने जा रहा हूं, जोकि मेहसाना से शुरू होती है और बठिंडा सिटी के रेलवे स्टेशन पर खत्म। मुझे पढ़ने का बहुत शौक है, लेकिन कोर्स की किताबें नहीं, बल्कि पत्रिकाएं व जानकारी देने वाले रोचक समाचार पत्रों के पन्ने। मैं शनिवार को जैसे ही मेहसाना के रेलवे स्टेशन पर पहुंचा तो मुझे वहां लगे ब्‍लॉक ने बताया दिया था कि गाड़ी आने में अभी एक घंटा बाकी है। इस एक घंटे को कैसे गुजारा जाए, इस पर मैंने बिल्कुल विचार नहीं किया, क्‍योंकि रेलवे स्टेशन में प्रवेश करते ही मेरी निगाह वहां स्थित बुक स्टॉल पर पड़ी, जहां पर बहुत सारी पत्रिकाएं व एक हिन्दी का न्यूजपेपर पड़ा था, जिसका नाम था राजस्थान पत्रिका, मैंने इस समाचार पत्र व दैनिक भास्कर की पत्रिका लक्ष्य को खरीदा, सच में दोनों पढ़ने के बाद लगा कि मैंने इस बार भी गलत जगह पैसे खर्च नहीं किए। लक्ष्य पत्रिका में भी पॉजिटिव थिंक की बातें लिखी हुई थी, और राजस्थान पत्रिका के मी डॉट नेक्‍सट में भी पॉजिटिव एटिट्यूड से संबंधित भरपूर जानकारी थी। दोनों को पढ़ते पढ़ते कम समय निकल गया पता ही नहीं चला। इतने में रेलगाड़ी प्लेटफार्म पर आ गई। मैं बैग उठाकर रेल गाड़ी की तरफ बढ़ा, लेकिन दिमाग इन दोनों चीजों में अभी भी मगन था। मैं एस सिक्‍स में घुसा और अपनी सीट नम्‍बर के पास गया था तो पता चला कि मेरी सीट एस सिक्‍स में नहीं और एस सेवन में है, मैं सॉरी बोलते हुए कोच से बाहर की तरफ दौड़ा और पहुंच गया अपनी सीट पर। मैं पूरी तरह चुपचाप, मानो जैसे में मौन धारण कर लिया हो। यह रिजर्वेशन कोच, मुझे जनरल कोच जैसा लग रहा था, क्‍योंकि मेरे जाने से पूर्व मेरी वाली सीट पर पांच जन बैठे हुए थे, जबकि सामने वाली सीटों पर छोटे छोटे बच्चे लेटे नींद का आनंद ले रहे थे। इस कोच सवार ज्यादा लोगों को माउंट आबू रोड़ उतरना था। एक व्यक्‍ति के मोबाइल पर गीत बज रहे थे, लेकिन मेरा दिमाग काम करना बंद कर चुका था। जो समाचार पत्र व पत्रिका रेलवे स्टेशन पर पढ़ी, उसमें एक बात थी कि चुनौतियों को देखकर घबराओ मत, उनका मुकाबला करो। यह परिस्थिति ऐसी थी, जिसको हैंडल करना जरूरी था, बिना किसी अन्य व्यक्‍ति को नुकसान पहुंचाए। मेरी निगाह मेरे सामने बैठी एक लडक़ी पर गई, जिसकी मोटी मोटी आंखों में काजल डाला हुआ था, वो बिल्कुल जब वी मेट की करीना जैसी नजर आ रही थी, लेकिन उसको भी वहीं तक जाना था जहां तक मेरी सीट पर बैठे लोगों को। वो अपने सामने बैठे एक व्यक्‍ति से बातें करने में मस्त थी, और बीच बीच में मुझे भी देख रही थी। वो निरंतर बोल रहा था, वह अलग अलग मुद्राओं में हां का संकेत देते हुए बातें सुन रही थी। मैं उसकी बदलती मुद्राओं को देखता रहा था, ताकि मेरे आस पास फैली अव्यवस्था पर मेरा ध्यान न जाए। कुछ घंटों के बाद माउंट आबू रोड़ आ गया, और रेलगाड़ी खाली हो गई एवं वो युवती भी उसी भीड़ केञ् साथ उतर गई। रेलगाड़ी खाली हुई एवं रोटी खाई और नींद का आनंद लिया। कुछ घंटों पश्चात गाड़ी फालना स्टेशन पर पहुंची और मैं घूमने के लिए थोड़ा नीचे उतरा तो आकर देखा मेरा बैग सीट के नीचे से निकालकर एक महिला ने अपने बैग वहां पर ठूंस दिए, मैंने अपना बैग अन्य जगह पर रख दिया। अब मेरी सीट के आस पास वाली छह सीटों पर पंजाबी गुजराती परिवार बैठा था, दोनों हिन्दी बोलना नहीं जानते थे, दोनों बातें करते एक दूसरे से लेकिन अपनी अपनी भाषा में। ऐसे में कुछ बातें समझाने के लिए मैं उनका ट्रांसलेटर बना, क्‍योंकि मेरा तालुक दोनों राज्यों से है। पंजाबी पूरी तरह जानता हूं तो गुजराती समझता हूं। धीरे धीरे सूर्य डूबता चला गया एवं अंधेरे की चादर फैलती चली गई। जोधपुर गाड़ी नौ बजे के करीब पहुंची। यहां पर एक यंग कपल हमारी सीटों के नजदीक पहुंचा। इस कपल के आने से मेरी उदासी भाग गई, जो मुझे कुछ कुछ पल बाद पकड़ रही थी। ऐसा नहीं कि यंग कपल में यंग लेडी मुझे अच्छी लग रही थी। इस यंग कपल के साथ एक छोटी सी उनकी बेटी थी, बिल्कुञ्ल रिदम जैसी। रिदम मेरी बेटी, जिसको नाना केञ् घर छोडक़र मैं पंजाब लौट रहा था। उसे बहुत ज्यादा मिस कर रहा था, उस बच्ची को देखकर मुझे रिदम याद आ रही थी, वो बच्ची बिल्कुञ्ल रिदम जैसी थी, लेकिन रिदम से पांच माह बड़ी। रिदम ने मेरे सफर पर निकलने से पहले खुद चलकर पांच फूट का सफर तय किया, जबकि राधिका बिंदास चल रही थी। रिदम की तरह राधिका ने भी अपने पापा को देर रात तक नहीं सोने दिया। वो उसको सुलाने की कोशिश करें तो वह रिदम की तरह ही चीखे। राधिका का बाप भी मेरी तरह उसको उठाकर रेलगाड़ी में घुमाने ले गया, ताकि कोई डिस्टर्ब न हो। एक चक्कर काटने के बाद राधिका करीबन सवा बारह बजे के करीब सो गई, तभी वहां टीटी आया, एवं 46 सीट पर सो रहे युवक से टिकट मांगा। वो टिकट दिखा रहा था कि इतने में दो अन्य यात्री टीटी केञ् पास आए एवं सीट देने का अनुरोध करने लगे, टीटी ने सख्‍ती से डांट फटकार लगाते हुए उनको वहां से भगा दिया एवं युवक की टिकट वापिस लौटते हुए सौ रुपए का नोट पकडक़र टीटी वहां से आगे बढ़ गया। कैञ्से खत्म हो सकता है भ्रष्टाचार, जिसकी जन्मदाता ही पब्‍लिक है। सोचते सोचते सो गया एवं सुबह उठा तो बठिंडा के बिल्कुल पास था। उठते ही निगाह सबसे पहले राधिका पर गई, जो धीमी आवाज में पापा वाली सीट पर खड़ी होकर मम्‍मी को उठने के लिए अनुरोध कर रही थी।&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-1178737145111089861?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/1178737145111089861/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=1178737145111089861&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1178737145111089861'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1178737145111089861'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='रास्ते में राधिका मिल गई'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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अपनों से करने लगते तो अचानक किसी बुद्धजीवि की बात कहकर उस स्थिति को संभाल लिया जाता, अच्छे लोगों को एक जगह स्थाई नहीं होना चाहिए, पानी की तरह व रमते जोगियों की भांति चलते रहना चाहिए। ऐसी ढेरों बातें, जो जुदाई के गम को कम कर देती थी, एक दूसरे से हम दोस्त बोलते रहते थे। किसी ने कहा है, जमीनी फासले कितने भी क्यों न हों, बस दिलों में दूरियां नहीं होनी चाहिए। ऐसे हालातों में इंदौर छोड़ दिया, इंदौर छोड़ने का गम कम, खुशी ज्यादा थी, क्योंकि अपने शहर लौटना किसे अच्छा नहीं लगता। शाम ढले तो परिंदे भी घरों को लौट आते हैं, मैं तो फिर भी साढे तीन साल बाद अपने वतन लौट रहा था। इस डेढ़ महीने के दौरान मुझे पहला झटका उस दिन लगा, जिस दिन एक मित्र का सुबह सुबह फोन आया कि विशाल का छोटा भाई सड़क हादसे में घायल हो गया। इस सूचना ने मानो, प्राण ही निकाल लिए हों। सबसे पहले जुबां से वो ही शब्द निकले, जो किसी अपने के लिए निकलते हैं, हे भगवान मेरे सांसों से कुछ सांस ले, उसमें डाल दे। इंदौर शहर में अगर कोई दरियादिल इंसान मिला तो विशाल, अपने नाम की तरह विशाल। अगली सुबह दोस्त का फिर फोन आया, विशाल का भाई चल बसा। इतनी बात सुनने के बाद विशाल को फोन करने की हिम्मत नहीं थी, और मैंने किया भी नहीं, क्योंकि जब मैं ही भीतर से संभल नहीं पा रहा था, उसको क्या हिम्मत देता। मैंने अपने दोस्त को कहा कि तुम उसके पास जाओ और हिम्मत देना। किस्मत देखो, जनक को भी शाम की रेल गाड़ी से अपने घर लौटना था, वो भी जॉब छोड़ चुका था। मुझे और जनक को तो दुख इस बात का था कि विशाल का भाई चला गया, लेकिन विशाल की किस्मत देखो, वो इस महीने में मुझे, जनक, नितिन और न जाने कितने दोस्तों को अपने शहर से विदाई दे चुका था। सोमवार को विशाल का मेल मिला कि उसने ऑफिस ज्वॉइन कर लिया, यह मेरे थोड़ा सा राहतपूर्ण मेल था, क्योंकि ऑफिस का काम व दोस्तों का मिलवर्तन उसके दर्द को थोड़ा सा कम कर देंगे। मैंने पंजाब से गुजरात के लिए रवाना होते हुए रेलगाड़ी में उसको फोन किया, उसने बताया कि उसने किताब संन्यासी जिसने अपनी संपत्ति बेच दी को फिर से पढ़ना शुरू कर दिया, मैंने उसको बताया कि मैंने पिछले डेढ़ महीने में अच्छे दोस्तों की कमी न खले के चक्कर में चार किताबें पढ़ डाली, डेल कारनेगी की समुद्र तट पर पिआनो, ऑग मेंडिनो की विश्व का सबसे बड़ा चमत्कार, चौबीस घंटों में बदलें जिन्दगी पयॉलो क्योलो की अल्केमिस्ट, जिससे कुछ लोग कीमियागर के नाम से भी जानते हैं। रेल गाड़ी जैसे ही राजस्थान को क्रोस करते हुए गुजरात में इंटर होने लगी, तो मेरे मोबाइल पर संदेश आने लगे, यह संदेश नेटवर्क बदलने का अलर्ट नहीं थे, यह संदेश एक बेहद बुरी खबर लेकर आए थे। इनमें लिखा था, वेबदुनिया मराठी के पूर्व वरिष्ठ उप संपादक एक सड़क हादसे में चल बसे, पहले पहल तो खबर अविश्वासनीय लगी, लेकिन संदेशों के बाद कुछ मित्रों के फोन आए, जो इस बुरी खबर को सच होने की पुष्टि कर रहे थे। इस घटना में मुझे एक बार फिर से बेचैन कर दिया, आखिर हो क्या रहा है? जिन्दगी ने आखिर हम सबको किस तरह अलग थलग किया है। अभिनय कुलकर्णी, जिसे मैं जल्दबाजी में अभय कुलकर्णी कह जाता था, मेरी अंतिम मुलाकात तब हुई, जब मैं बेवदुनिया छोड़ने का फैसला कर चुका था, एक कांफ्रेंस रूम में। फैसला करने के बाद जैसे ही मैं वेबदुनिया के ऑफिस में पहुंचा तो सब मेरी प्रतिक्रिया जाने के लिए तैयार थे, आखिर क्या हुआ? क्यों कि इस बिरह के मौसम की शुरूआत मुझसे होने वाली थी। मैंने जैसे ही बताया कि मैं वेबदुनिया छोड़ने वाला हूँ, तो बात पूरे ऑफिस में जंगल की आग की तरह फैल गई। मेरे बाद शायद अभिनय कुलकर्णी को भी बुलाया जाना था, वो मेरा फैसला सुनने के बाद काफी बेचैन हो गए, होते भी क्यों न, आखिर पूरा परिवार जो इंदौर में बसा चुके थे, और कंपनी के प्रति खुद को पूरी तरह समर्पित कर चुके थे, कई अच्छे मौके उन्होंने अच्छे वक्त भी ठुकरा दिए थे, लेकिन अब स्थिति ऐसी थी कि अब उन मौकों को आगे से जाकर मांगना था, जिनको ठुकरा चुके थे वो कई दफा। उसके दिन के बाद, मेरी और उनकी कोई बात नहीं हुई, लेकिन कल जैसे ही मुझे पता चला कि वो इस तरह दुनिया से चले गए, पांव तले से जमीन निकल गई। यह बेहद बुरी खबर थी मेरे लिए अब तक की, क्योंकि वेबदुनिया के क्षेत्रीय भाषा के जितने भी पोर्टल थे, उन पोर्टलों में सबसे बढ़िया वरिष्ठ उप संपादक थे, जिन्होंने लम्बे समय तक बिना किसी विवाद के अपना कार्यकाल खत्म किया, लेकिन वो इस तरह दुनिया से ही रुखस्त हो जाएंगे किसी ने नहीं सोचा था। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।&lt;/div&gt;&lt;a class="google-buzz-button" data-button-style="small-count" data-locale="en_IN" href="http://www.google.com/buzz/post" title="Post on Google Buzz"&gt;&lt;/a&gt; &lt;script src="http://www.google.com/buzz/api/button.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;input id="gwProxy" type="hidden" /&gt;&lt;input id="jsProxy" onclick="jsCall();" type="hidden" /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div id="refHTML"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-5951350503000775739?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/5951350503000775739/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=5951350503000775739&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/5951350503000775739'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/5951350503000775739'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='पिछले डेढ़ महीना-बिरह का महीना'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8579678448274361757</id><published>2010-06-01T15:40:00.005+05:30</published><updated>2010-06-01T15:48:00.308+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंदौर'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पितृ पर्वत'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्वर्ग'/><title type='text'>पितृ पर्वत - मेरे लिए स्वर्ग सा</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a class="google-buzz-button" data-button-style="small-count" data-locale="en_IN" href="http://www.google.com/buzz/post" title="Post on Google Buzz"&gt;&lt;/a&gt; &lt;script src="http://www.google.com/buzz/api/button.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt; इंदौर में मेरी सबसे पसंदीदा जगह है पितृ पर्वत। जहाँ पहुंचते ही मैं तनाव मुक्त हो जाता हूँ, शायद इसलिए कि वहाँ बुजुर्गों का बसेरा है, और मुझे बुजुर्गों के साथ समय बिताना ब्लॉगिंग करने से भी ज्यादा प्यारा लगता है, लेकिन शर्त है कि बुजुर्ग सोच से युवा होने चाहिए। यहाँ पर बुजुर्गों की याद में पेड़ पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन यह पूरी तरह से नहीं कह सकता कि अपने बुजुर्गों की याद में लगाए इन पेड़ पौधों को कोई बाद में देखने आता भी है कि नहीं। चलो छोड़ो, वैसे भी हम खानापूर्ति में कुछ ज्यादा ही विश्वास करते हैं, इतना ही काफी है कि बुजुर्गों की याद में पेड़ पौधे तो लगते हैं। हो सकता है कि कभी कोई पोता या पोती अपने प्रेमी के साथ यहाँ घूमने आए, और उस पेड़ के तले बैठकर सुकून के पल गुजारे, जिसे बहुत पहले उनके परिजनों ने उनके पूर्वजों की याद में रोपा था।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेकिन मेरी हैरत की तब कोई हद नहीं रहती, जब कोई इंदौर में सालों से रह रहा व्यक्ति कहता है, वहाँ तो केवल पेड़ पौधे ही लगाए जाते हैं, वहाँ घूमे जैसी तो कोई चीज ही नहीं। वो चीज कहते हैं, जिसको मैं स्वर्ग कहता हूँ।  रविवार शाम को अपने कुछ जान पहचान के लोगों के साथ पितृ पर्वत की सैर करने निकला, वो सब सालों से इंदौर में रह रहे हैं, लेकिन इस स्वर्ग से रूबरू कभी नहीं हुए, लेकिन रविवार जैसे ही उन्होंने यहाँ का नजारा देखा तो देखते ही रह गए। एक घंटे में लौटकर आने की सोचकर गए, करीब साढ़े तीन घंटों बाद घर की तरफ लौटे। वहाँ पहुंचकर जो आनंद मुझे मिलता है, वो मैं ही जानता हूँ, क्योंकि दुनिया में आनंद एवं सत्य को जानने के लिए खुद जाना पड़ता है, वरना दोनों सदैव अधूरे रहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;इसके बाद पता नहीं, अब कब मौका मिलेगा, इन बुजुर्गों से मिलने का, जो पेड़ पौधों के रूप में खड़े मेरे इस स्वर्ग की शोभा को चार चाँद लगाते हैं, क्योंकि अब इस परिंदे का इंदौर से दाना पानी खत्म हो चुका है, और अपने घर की तरफ कूच कर रहा है। दिन प्रति दिन फैलते इंदौर को देखकर सोचता हूँ कि जब अगली बार इंदौर आऊंगा, अपने कुछ मित्रों से मिलने क्या इंदौर के बाहर बाहर स्थित इस स्वर्ग के दर्शन हो पाएंगे? क्यों यहाँ के भूमाफिया ऐसे हैं कि गार्डन तक बेचते हैं, और सरकारी अधिकारियों को भनक तक नहीं लगती।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8579678448274361757?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/8579678448274361757/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=8579678448274361757&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8579678448274361757'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8579678448274361757'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='पितृ पर्वत - मेरे लिए स्वर्ग सा'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8779666748460818645</id><published>2010-05-29T22:52:00.002+05:30</published><updated>2010-05-29T22:54:08.122+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मित्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='वेबदुनिया'/><title type='text'>अलविदा दोस्तो, जिन्दगी रही तो हजार मुलाकातें</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a class="google-buzz-button" data-button-style="small-count" data-locale="en_IN" href="http://www.google.com/buzz/post" title="Post on Google Buzz"&gt;&lt;/a&gt; &lt;script src="http://www.google.com/buzz/api/button.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt; हैप्पी तेरा फोन, पास बैठे मेरे मित्र यशपाल शर्मा ने फोन को मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा। मैंने फोन को थामते हुए..हैल्लो हैल्लो किया, सामने से संदीप सर की आवाज आई, "हैप्पी तुमको आज दो बजे जयदीप सर ने रॉल्टा बजाज वाली बिल्डिंग में बुलाया है। मैं सीट से उठा, और पारूल को कहा, चलो जल्दी खाना खाकर आते हैं, क्योंकि मुझे रॉल्टा बजाज वाले दफ्तर जाना है, वहाँ जयदीप सर ने बुलाया है। हम घर आए, बहन खाना बनाने में लगी हुई थी, जल्दी जल्दी लाँच किया। पारूल ने मुझे कुछ ट्रिक दिए, जो मेरे लिए किसी काम के नहीं थे, क्योंकि मैं मौके और स्थिति को देखकर बात करने में यकीन रखता हूँ, मैंने उसको कहा, वहाँ कोई भी बात हो, तुम मुझसे शाम तक नहीं पूछोगी, क्योंकि आज तेरा जन्मदिन है, और मैं चाहता हूँ, तेरा आज का दिन अच्छा निकल जाए। फिर ऐसे ही अचानक मेरे मुँह से निकल गया, आज सर बुलाएंगे, और कहेंगे हैप्पी तुम कल से काम पर मत आना और अपने त्याग पत्र पर साईन कर दो। वो बोली फिर तो मजा आ जाएगा। मैंने जल्दी जल्दी उसको ऑफिस छोड़ और खुद रॉल्टा बजाज बिल्डिंग की तरफ निकल गया।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वहाँ पहुंचा तो वेटिंग करने के लिए कहा गया। वो ही सोफा था, वो ही स्वागत रूम, जब मैं आज से करीब साढ़े तीन साल पहले 27 दिसम्बर 2006 को वेबदुनिया में इंटरव्यू देने आया था, इंटरव्यू कैसा, पता ही था, नतीजा सकारात्मक जाएगा, हो सकता है पैसों को लेकर मामला अटक जाए, लेकिन मुझे पैसे से मोह कम है, वहाँ भी बात न अटकने वाली थी। उस इंटरव्यू में पास हुआ, तभी तो आज साढ़े तीन साल बाद फिर उसी स्गावत कक्ष में उसी सोफे पर बैठा इंतजार कर रहा था, कब सर बुलाएंगे? और बताएंगे इस बार कितनी कितनी सैलरी बड़ी है, वो बात भूल गया जो पत्नि को मजाक मजाक में कहकर निकला था।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दो कप चाय पीने और काफी चेहरों को नहारते नहारते अब उबने लगा था कि इतने में अंदर जाने का फरमान आ गया। अंदर गया, वहाँ पर सर के अलावा कंपनी के अन्य उच्च अधिकारी भी उपस्थित थे। मुझे कुछ बातें सुनने के बाद साफ हो गया था कि बेटा जो बात पत्नि को बोलकर आया है, वो बात उस समय भले ही मजाक रही हो, लेकिन अब वो सत्य के इतने करीब थी कि मौन के समय जितने लब एक दूसरे के करीब होते हैं। कंपनी पदाधिकारियों ने मेरे सामने दो विकल्प रख दिए, एक त्याग पत्र और दूसरा विभाग बदलने का, तो मैंने त्याग पत्र वाला विकल्प मैंने झट से स्वीकार कर लिया। मुझे कोई अफसोस न हो रहा था, क्योंकि मेरे जेहन में गुरू हरिदत्त जोशी के संवाद बनिए की दुकान है, कब लात मारकर भगा दें, पता नहीं, रितेश श्रीवास्तव के संवाद, लाले की नौकरी है बाबू और रणधीर सिंह गिलपत्ती के संवाद मजदूरी करते हैं घूम रहे थे। जब मैं दैनिक जागरण बठिंडा में था, तो उक्त संवाद मेरे कानों में पड़ते ही रहते थे। इन संवादों ने मुझे तब तब बहुत शक्ति थी, जब जब मैंने नौकरियाँ त्यागी। मेरा मानना है कि जब एक दरवाजा बंद होता है तो कई और दरवाजे तुम्हारे लिए खुल चुके होते हैं। इस बात को सत्य होते हुए मैंने कई दफा देखा, और इस बार भी देख रहा हूँ, दोस्तो।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मुझे तो इंतजार था, इस दिन का, और मैं वतन वापसी के लिए तो बहुत समय से उतावला था, लेकिन कहते हैं वक्त से पहले और तकदीर से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता। मुझे बहुत कुछ मिला है, जिसके लिए मेरी जिन्दगी में आने वाले हर शख्स का मैं ऋणि हूँ। इस संस्थान से भी मुझे बहुत कुछ मिला है, अगर यहाँ तक न आता तो शायद कभी ब्लॉगिंग की दुनिया में कदम न रख पाता। शायद इतना कुछ लिखने का साहस भी न कर पाता। मुझे इस संस्थान की बदौलत एक से एक बढ़कर इंसान मिले, जिनसे मुझे कुछ न कुछ सिखने को मिला, प्यार स्नेह तो अलग से। आज मुझे इस संस्थान से कोई गिला नहीं, और नाहीं होगा। शुरू शुरू में जरूर था, लेकिन तब न-समझ था, सुविधाएं ढूँढने के चक्कर में कंपनी को कोसता था, लेकिन जब समझ में आया कि सुविधाओं से तो कोई भी बेहतर कर लेता है, मजा तो तब है प्यारे, अगर आप असुविधाओं में रहकर कुछ बेहतर कर पाओ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;अलविदा दोस्तो..जिन्दगी रही तो हजार मुलाकातें..नहीं तो, कहीं नहीं गई यादें और बातें।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8779666748460818645?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/8779666748460818645/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=8779666748460818645&amp;isPopup=true' title='29 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8779666748460818645'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8779666748460818645'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/05/blog-post_29.html' title='अलविदा दोस्तो, जिन्दगी रही तो हजार मुलाकातें'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7883893135617319298</id><published>2010-05-07T09:17:00.002+05:30</published><updated>2010-05-08T06:18:37.334+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a class="google-buzz-button" data-button-style="small-count" data-locale="en_IN" href="http://www.google.com/buzz/post" title="Post on Google Buzz"&gt;&lt;/a&gt; &lt;script src="http://www.google.com/buzz/api/button.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt; गाँव के कच्चे रास्तों से निकलकर शहर की चमचमाती सड़कों पर आ पहुंचा हूँ। इस दौरान काफी कुछ छूटा है, लेकिन एक लत नहीं छूटी, फकीरों की तरह अपनी ही मस्ती में गाने की, हाँ स्टेज से मुझे डर लगता है। गाँवों की गलियाँ, खेतों की मिट्टी, खेतों को गाँवों से जोड़ते कच्चे रास्ते आज भी मुझे मेरी इस आदत से पहचान लेंगे, भले ही यहाँ तक आते आते मेरे रूप रंग, नैन नक्श में काफी बदलाव आ गए हैं। &lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;जब गाँव से निकला था, बड़ी मुश्किल से 18 साल का हूँगा। माँ ने रोका था, मत जा शहर अभी तुम बहुत छोटे हो। अभी तुम हमारे साथ यहाँ रहो। शहर में बहुत भीड़ भाड़ है। तुमको अंधेरे से डर लगता है। अभी तुम पढ़ाई करो। नौकरी नाकरी बाद में कर लेना, लेकिन गाँव में रहने के लिए कुछ न था, किसके भरोसे रहता। वो माँ भी जानती थी, लेकिन माँ तो आखिर माँ होती है। वो कैसे अपने जिगर के टुकड़े को कुछ कागज के टुकड़ों के लिए आँखों से ओझल कर दे।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गाँव छोड़ने के बाद मेरी स्थिति शादी कर चली गई लड़की जैसी हो गई, जो ससुराल में इतनी व्यस्त हो गई कि मायके में बस कभी कभार कुछ पलों के लिए ही आना होता है। माँ की दवाई लेकर जाना, गाँव जाने का एक मात्र बहाना हो गया था, इसके अलावा कुछ नहीं। बस माँ के दर्शन किए, दवाई थमाई, और हालचाल पूछा नहीं कि बस ने गाँव के दूसरे बस स्टेंड से हॉर्न बजा दिया, जैसे कह रही हो प्लीज हरी! अप। जो माँ मेरे लिए बनाती वो घर में बहन के लिए ही छूट जाता, वो बीमार थी, लेकिन बेटे के आने की बात सुनते ही तंदरुस्त हो उठी, पता नहीं क्या ऊर्जा थी बेटे के आने की खबर में, और मैं भागती जिन्दगी में सोच ही नहीं पाया कि जिन्दगी हमारी मुट्ठी में भरी रेत की तरह कण कण होकर फिसल रही है। जिन्दगी एक सफर है, इसको कहीं न कहीं तो खत्म होना है, शायद किसी का पहले और किसी का बाद में।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;माँ बीमार थी, लेकिन फिर भी जब मैं शहर से फोन लगाता तो माँ सबसे पहले मेरा हाल पूछती, जबकि हाल तो मुझे पूछना होता था उसका। उस समय मेरे घर में एक भी फोन नहीं थी, लेकिन आज वो नहीं तो घर में तीन तीन फोन हैं, घर का अलग, भाई का अलग और पिता का। वो दंग रह जाती जब मैं उसको बताता कि मैं ऑफिस में से बहुत देर रात निकलता हूँ घर के लिए, क्योंकि वो जानती थी मैं अंधेरे से बहुत डरता था, इतना कि पेशाब करने के लिए भी रात को रोशनी से परे एक कदम भी नहीं उठाता था। फिर पूछती खाना पीना तो अच्छा है, हाँ तेरी मौसी बता रही थी कि तुम दिन में एक बार खाना खाने लग गए हो, तो मैं कहता नहीं नहीं बाज़ार से कुछ खा लेता हूँ। कैसे कहता कि माँ मुझे रोटियाँ अच्छी नहीं लगती। गाँव में दिन की 27 रोटियाँ तोड़ने वाला शहर की भाग दौड़ में सिर्फ पाँच छ: रोटियों पर आ गया है। उसको कैसे बताऊं कि शहर आकर जाना है मैंने रोटियाँ गिनकर बनाई जाती हैं, तेरी तरह नहीं कि रोटियों से छाबा (रोटियाँ रखने वाला स्तूत की लड़की से बना डिब्बा) भरकर रख दो, जब चाहे मेरे बच्चों का मन करे खा लें। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बेटे से दूर गाँव में रहना अब मुश्किल हो रहा था, शायद इसलिए एक दिन उसने फैसला किया कि अब वो शहर रहेगी, शहर की फिजाओं को माँ का फैसला ठीक न लगा, और जिस सुबह माँ ने फैसला लिया, उसी दिन की शाम वो सदा के लिए अलविदा कहकर चली गई। जाना तो सब को है, लेकिन अच्छे लोगों के साथ समय कुछ ज्यादा ही गुजारने को मन करता है। माँ के जाने के बाद सब शहर आ गए, लेकिन मैं कमबख्त फिर शहर छोड़ आया, मुझे याद है, एक बार एक पंडित ने कहा था, इस लड़के के नसीब में घर में रहना लिखा ही नहीं। पंडित की बात बेघर होना, उस घर तक ही सीमित थी, या मेरे नए बसे घर पर भी लागू होती है मुझे नहीं पता, जिसमें मैं, मेरी बिटिया और उसकी माँ रहते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7883893135617319298?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/7883893135617319298/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=7883893135617319298&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7883893135617319298'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7883893135617319298'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='लिखने कुछ और बैठा था...लिख बैठा माँ के बारे में।'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-3456103436326364904</id><published>2010-04-09T10:50:00.004+05:30</published><updated>2010-04-18T22:28:14.651+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्कूल'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>उस दिन का पागलपन</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a class="google-buzz-button" data-button-style="small-count" data-locale="en_IN" href="http://www.google.com/buzz/post" title="Post on Google Buzz"&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.google.com/buzz/api/button.js" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;दो बजने में कुछ मिनट बाकी थे, और स्कूल की छुट्टी वाली घंटी बजने वाली थी, लेकिन हम दूसरे गाँव से पढ़ने आते थे, इसलिए हमारे लिए स्कूल की घंटी बजने से ज्यादा महत्वपूर्ण था बस का हॉर्न। उस दिन जैसे ही बस ने गाँव के दूसरे बस स्टॉप से हॉर्न&amp;nbsp; दिया, तो हमारे गाँव के सब लड़के स्कूल के मुख्य दरवाजे की तरफ दौड़ने लगे।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;मेरे गाँव के सब लड़के स्कूल की दीवार के उस पार खड़े मुझे आवाज दे रहे थे, ओए पंडता (पंडित) जल्दी आ, बस आने वाली है, लेकिन मैं और मेजर फँसे खड़े सौ के करीब लड़कों की भीड़ में। पंगा पड़ा हुआ था, एक लड़की को लेकर, जो इस स्कूल में पढ़ने के लिए आई थी, दूसरे किसी शहर से, लेकिन उसके शहरीपन ने स्कूल का माहौल बिगाड़ दिया, अब हर कोई प्यार इश्क की बातें करने लगा, लड़कियाँ लड़कों से फ्रेंडशिप करने के बारे में सोचने लगी। बस गलती इतनी सी थी मेजर की, वो दोस्त के कहने में आ गया और सोचने लगा वो लड़की उस पर मरती है, जबकि ऐसा कुछ नहीं था, क्योंकि मैं उससे स्पष्ट शब्दों में पूछ चुका था। सुंदर लड़की पर कौन नहीं मरना चाहेगा, पूरा स्कूल उसकी तरफ देखता था, मैं नहीं मेरी निगाहें कहीं और थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब जैसे स्कूल में पता चला कि मेजर उस लड़की पर लाईन लगाता है, तो उस गाँव के सब लड़के सख्ते में आ गए। और उन्होंने मेजर को स्कूल में पीटने का प्लान बना लिया। मेरे सब दोस्तों को पहले पता चल गया था, वो सब के सब तो स्कूल के पिछले रास्ते से निकल बस स्टॉप पर पहुंचकर मुझे आवाज दे रहे थे, लेकिन मैं मेजर को स्कूल के बरामदों से बस स्टॉप की तरफ खींचकर ले जा रहा था, वो लड़कों की भीड़ देखकर घबरा रहा था, पैर पीछे खींच रहा था, लेकिन मेरा मन उसको अकेले छोड़ भाग जाने को नहीं करा, मैंने कहा मैं भी तो तेरे साथ चल रहा हूँ, तू क्यों डर रहा है, तुझे रोज इस स्कूल में आना है, अगर तू डरेगा तो ये लोग तुम्हें घर में घूसकर मारेंगे, तू डर मत मेरी बाजू पकड़, मैं देखता हूँ कौन रोकता है रास्ता। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सौ के करीब लड़कों की भीड़ मुख्य द्वार और बरामदे के बीच वाले रास्ते पर खड़ी थी, जैसे ही हमने कदम बरामदे से बाहर निकाले, वो सबके सब मारने के लिए अपने हाथ को तनने लगे, वो किसी भी समय हम पर हमला कर सकते थे, लेकिन मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ा, अब हम दोनों को लड़कों ने चारों ओर से घेर लिया था। एक लड़के ने मुट्ठी बंद कर जैसे ही मेरे गुप्तअंग की तरह प्रहार करने की कोशिश की, तो एक पीछे से आई आवाज ने उसकी मुट्ठी को वहाँ ही रोक दिया। "पंडतां दा मुंडा ए, देखके मारी" (पंडितों का लड़का है, देखकर मारना)। इस पंक्ति ने सबको पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया, और मैं निरंतर उसको लेकर आगे बढ़ता गया, और हम स्कूल के द्वार के बाहर निकल गए, कुछ देर में उधर से बस भी आ गई, हम दौड़कर बस की छत्त पर चढ़ गए। मेरे दोस्तों ने कहा, ओए पंडता तू बच गया, आज तेरे साथ बहुत बुरा होता, तुम्हें सन्नी देओल बनने की क्या जरूरत थी। इतना सुनते ही जब मैं उस दृश्य को ख्याल में देखा तो सच मानो, मेरे पैरों तले जमीं निकल गई, अगर कुछ हो जाता तो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;b&gt;आभार&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://cooltext.com/"&gt;&lt;img alt="कुलवंत हैप्पी" height="38" src="http://images.cooltext.com/1472650.gif" width="108" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-3456103436326364904?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/3456103436326364904/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=3456103436326364904&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/3456103436326364904'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/3456103436326364904'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/04/blog-post.html' title='उस दिन का पागलपन'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7259280646725290045</id><published>2010-03-26T07:00:00.007+05:30</published><updated>2010-04-15T19:58:28.694+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='युवा सोच युवा खयालात'/><title type='text'>मुझे माफ कर देना, नालायक बच्चा समझकर</title><content type='html'>पिछले कई दिनों से उलझन में था, करूं या न करूं। दिल कहता था करूं और दिमाग कहता था छोड़ यार। वैसी ही स्थिति बनी हुई थी, जैसे प्रेमी को पहला पत्र लिखने के वक्त बनती है, कई कागद काले कर दिए, फिर फाड़कर फेंक दिए, ऐसे ही कई नाम लिखे और मिटा दिए, लेकिन कल रात एक मित्र की मदद करते हुए मैंने जो नाम ब्लॉग के लिए सोचा था,&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt; उसको दे दिया, लेकिन उसको पसंद न आया। फिर मैंने बिना किसी देरी के तुरंत लगा लिया, बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी चीज को खोने के संदेह से उसके प्रति प्रेम उमड़ आता था। जैसे ही उसने इंकार किया, वैसे ही मैंने उस नाम को अपने सीने से लगा लिया, कहीं गुम न जाए, कहीं खो न जाए। &lt;i&gt;&lt;b&gt;युवा सोच युवा खयालात &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;तो टैगलाईन वैसे की वैसी ही है, लेकिन उसका यूआरएल बदल दिया, &lt;i&gt;&lt;b&gt;कुलवंत84&lt;/b&gt;&lt;/i&gt; की जगह &lt;a href="http://yuvatimes.blogspot.com/"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;युवाटाईम्स &lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/a&gt;कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा करने से मेरे कुछ चाहने वालों को दिक्कत हो सकती है, जिनके ब्लॉग में मेरा ब्लॉग एड्रेस है, उससे मैं क्षमा चाहता हूँ, लेकिन मुझे पता है कि मेरी गलती, उनके प्रेम के आगे बहुत छोटी है, वो मुझे माफ कर देंगे और मेरा नया ब्लॉग पता अपने ब्लॉग में जोड़ लेंगे। मैं तो सदैव आपके प्यार का ऋणि रहूँगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मँसूर से किसी ने पूछा इश्क क्या है, जब वो सूली पर लटकने के लिए तैयार थे। उन्होंने कहा कि आज, कल और परसों देख लेना। इस अर्थ था, आज सूली पर लटकना, कल जनाजा उठेगा और परसों धूल उड़ाई जाएगी। जिसको मैंने अपने शब्दों में कुछ इस तरह लिखा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;आज मरना, कल जनाजा, परसों इश्क मुकम्मल मेरा।&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;&lt;i&gt;&lt;b&gt;आ&lt;/b&gt;&lt;/i&gt;&lt;/span&gt;&lt;b&gt;भार&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: right;"&gt;&lt;a href="http://cooltext.com/"&gt;&lt;img alt="कुलवंत हैप्पी" height="45" src="http://images.cooltext.com/1432034.gif" width="125" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7259280646725290045?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/7259280646725290045/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=7259280646725290045&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7259280646725290045'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7259280646725290045'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/03/blog-post_26.html' title='मुझे माफ कर देना, नालायक बच्चा समझकर'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4271470578668691575</id><published>2010-03-19T18:56:00.002+05:30</published><updated>2010-04-15T19:59:09.518+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टीआई'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='भतीजी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्लैमबुक'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंदौर'/><title type='text'>स्लैमबुक और उसकी मानसिकता</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुछ दिन पहले बठिंडा से मेरे घर अतिथि आए थे, वो मेरे खास अपने ही थे, लेकिन अतिथि इसलिए क्योंकि वो मुझे पहले सूचना दिए बगैर आए थे, और कमबख्त इस शहर में कौएं भी नहीं, जो अतिथि के आने का संदेश मुंढेर पर आकर सुना जाएं। वो आए भी, उस वक्त जब मैं बिस्तर में था, अगर खाना बना रहा होता तो शायद प्रांत (आटा गूँदने का बर्तन) में से आटा तिड़क कर बाहर गिर जाता तो पता चल जाता कोई आने को है।&lt;/div&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt; वो कुछ दिन यहाँ रहे, मुझे अच्छा लगा, लगता भी क्यों ना, तीन साल में पहली बार तो कोई बठिंडा से आया था, जो मेरे घर रुका। आने वाले अतिथियों में मेरी मौसी, मौसी की पोती यानी मेरी भतीजी, मौसेरा भाई और उसकी पत्नी। मौसेरा भाई अपना सामान और कुछ अन्य काम निपटाने आया था, और इस दौरान सैर सपाटा तो होना ही था, जो हुआ। एक दिन हम सब इंदौर के बेहद प्रसिद्ध मॉल टीआई में गए, वहाँ के बिग बाजार में से मेरी भतीजी, जिसकी उम्र लगभग 11 साल होगी, ने एक स्लैमबुक खरीदी, जो पिछले कई दिनों से खरीदने की जिद्द कर रही थी, जबकि मैंने उसको कहा था कि दोस्तों की जगह दिल में होती है, स्लैमबुक में तो सिर्फ सिर्फ सिरनामें (पते) रह जाते हैं। उसने बिग बाजार से स्लैमबुक ले ली, और बाहर आ गई। मैं उससे दूर था, वो बार बार कुछ कह रही थी, जो सुनाई नहीं दे रहा था। मैं सीढ़ियाँ चढ़ रहा था, और मेरा मौसेरा भाई सीढ़ियाँ उतर रहा था। स्व-चलित सीढ़ियाँ थी, स्लैम बुक का बिल करवाने जा रहा हूँ वो कहते हुए नीचे जा पहुंचा, लेकिन इतने में एक आवाज गई अगर पैसे ज्यादा हैं तो भाई हमें दे दो। बस उसका मन बदला, और वो फिर ऊपर आ गया। मैंने अपनी भतीजी के पास जाकर पूछा क्या हुआ? तुम सबसे क्या कह रही हो धीरे धीरे? उसने बताया कि वो स्लैम बुक जो लेकर आई हूँ, उसका बिल नहीं हुआ। मैं हैरान था, आखिर वो स्लैमबुक बिग बाजार से बाहर तक लेकर कैसे आई, बिन बिल के। उसने बताया कि जब उससे बिल पूछा गया तो उसके साथ आ रहे एक मेरे अन्य मित्र ने कहा सब चीजों का बिल हो गया। मैंने कहा कि अगर बिल न हुआ हो..तो वहाँ सूचना यंत्र बजना शुरू हो जाता है। उसने कहा कि ऐसा तो कुछ नहीं हुआ, मतलब खुदा आज उसका इम्तिहान ले रहा था। बाकी सब खुश थे, क्योंकि उनके 45 रुपए बच रहे थे, लेकिन वो 11 साल की बच्ची खुश न थी, उसको लग रहा था कि उसने चोरी कर ली। हम टीआई से खजराना मंदिर गए, वहाँ से करीबन 11 बजे लौटे, तब तक वो कहती रही चाचा वो स्लैम बुक का बिल करवा आते तो अच्छा रहता। मैंने उसको भरोसा दिया कि मैं उसका बिल करवा आऊंगा, जब फिर बिग बाजार जाऊंगा। जिसके बाद जाकर वो संतुष्ट हुई। मुझे इस बच्ची पर इसलिए नाज होता है, क्योंकि वो शुरू से ही ऐसी है। जब वो सात आठ साल की थी, तब उसके जन्मदिन पर मैं उस को एक गिफ्ट दिलाने के लिए एक शॉप ले गया, उसको एक बनावटी एक्यूरियम पसंद आ गया, वो शायद पौने दो सौ का था। मैंने दुकानदार को जब पैसे दिए उसने देख लिया। घर जाते हुए बोली। चाचा कुछ सस्ता ले लेते, तुम्हारा ज्यादा खर्च हो गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4271470578668691575?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4271470578668691575/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4271470578668691575&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4271470578668691575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4271470578668691575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/03/blog-post.html' title='स्लैमबुक और उसकी मानसिकता'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7174560828063251973</id><published>2010-02-19T15:01:00.005+05:30</published><updated>2010-04-15T19:59:40.348+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नाड़ी निरीक्षण'/><title type='text'>जब हुआ नाड़ी निरीक्षण</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-size: large;"&gt;ग&lt;/span&gt;त 17 फरवरी से योग शिविर जा रहा हूँ, एक दोस्त के निवेदन पर, ताकि दोस्ती भी रह जाए और सेहत में भी सुधार हो जाए। योग शिविर में जाकर बहुत मजा आ रहा है, क्योंकि वहाँ पर बच्चा बनने की आजादी है, जोर जोर से हँसने की आजादी है, वहाँ पर बंदर उछल कूद करने की आजादी है। सुना तो बहुत बार है कि मानव रूपी पुतला पाँच तत्व से बना है, &lt;/div&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;लेकिन उसको भी तीन श्रेणियों में बाँटा जाता है, पहली बार जानने को मिला। वहाँ जाकर पता लगा कि मनुष्य में तीन प्रकार की प्रकृति पाई जाती हैं कफ, पित्त और वात। एक महिला प्रवक्ता ने इस पर थोड़ी जानकारी दी, उसको सुनने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मैं पित्त प्रकृति का व्यक्ति हूँ, जो जो लक्षण उन्होंने बताए वो मैंने खुद में महसूस किए, लेकिन मेरी स्वीकारने की भावना मेरे दोस्त को खनक गई। उसने कहा कि नाड़ी निरीक्षण करवा, मुझे लगता है तुम्हारी प्रकृति कफ है। तो मैंने कहा, नहीं यार जो लक्षण बताएं हैं वो तो मेरे भीतर हैं। वो माना नहीं, और मैं भी ठहरा जिद्द का पक्का। शुक्रवार को जैसे ही योग शिविर की समाप्ति हुई, तो पहुंच गया वहाँ मौजूद डॉक्टरनी साहिब से नाड़ी निरीक्षण करवाने। &lt;b style="color: red;"&gt;&lt;i&gt;कुर्सी पर बैठते हुए आँखें बंद करने से पहले मैंने बाईं बाजू आगे कर दी, क्योंकि मुझसे पहले नाड़ी निरीक्षण करवा रही महिला ने भी उसी बाजू को आगे किया था। मेरी बाईं बाजू को देखकर डॉक्टरनी साहिबा बोली, दूसरी बाजू आगे करो। मैं मन ही मन में हँस रहा था, बहुत पुरानी बात को याद कर, एक बार पहले भी किसी हस्तरेखा माहिर ने मुझे ऐसा ही कहा था कि दूसरी बाजू आगे करो। मैंने दाईं बाजू आगे कर दी। डॉक्टरनी साहिबा ने मेरी कलाई के आसपास की नसों को दबा दबा कर कुछ महसूस करने की कोशिश की, तब मैं बंद आँखों के सामने हिरन, खिलते हुए फूल और पहाड़ों से गिरता पानी महसूस कर रहा था। उस सुंदर नजारे के साथ साथ &lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;i&gt;मुझे समझ भी आ रहा था कि&amp;nbsp;&lt;/i&gt;&lt;/b&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&lt;i&gt; डॉक्टरनी साहिबा के कुछ पल्ले नहीं पड़ा रहा,&amp;nbsp; मेरा सोचना शुरू ही था कि उन्होंने थोड़ी&amp;nbsp; देर बाद मेरी दाईं बाजू को छोड़ दिया और बोली कि&amp;nbsp; दूसरी बाजू को आगे करो।&amp;nbsp; मैंने फिर बाईं बाजू आगे बढ़ा दी, जिसको उन्होंने नकार दिया था। फिर थोड़ी देर तक निरीक्षण चला और अंतिम में डॉक्टरनी साहिबा बोली।&lt;/i&gt;&lt;/b&gt; जहाँ तक मुझे लगता है तुम पित्त प्रकृति के हो, मतलब दोनों बाजू देखने के बाद भी केवल उसको लगा। पक्की गारंटी नहीं दे सकी कि मैं पित्त प्रकृति का हूँ, मुझे क्या करना था वो सब जानकर, &lt;b&gt;&lt;a href="http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html" style="color: lime;"&gt;मैं जो हूँ, वो मैं अच्छी तरह जानता हूँ&lt;/a&gt;&lt;/b&gt;, लेकिन दोस्त के व्याकुल मन को संतुष्ट करना था मुझे तो। दोस्त भी बड़ा अजीब है, वो फिर भी मानने को तैयार नहीं हुआ, वो बोला तुम कफ प्रकृति के हो। दोस्त को ही शांति देनी थी, तो मैंने कह दिया दोनों प्राकृतियों का हूँ। जब घर पहुंचा तो सोचा। दोस्त कहता है कफ प्रकृति हूँ, डॉक्टरनी साहिबा कहती हैं कि पित्त प्रकृति का हूँ। मतलब अब एक प्रकृति बची है वात, लगते हाथ उसको भी ग्रहन करन लेता हूँ। डॉक्टरनी साहिबा की जाँच देखकर दोस्त भी घबरा गया था, जो घबराहट मैंने महसूस की उसके दिल में, क्योंकि डॉक्टरनी साहिबा सबको एक ही बाजू चैक करके बता देती थी, लेकिन पहला व्यक्ति था, जिसकी दोनों बाजूओं को चैक करना पड़ा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7174560828063251973?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/7174560828063251973/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=7174560828063251973&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7174560828063251973'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7174560828063251973'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_19.html' title='जब हुआ नाड़ी निरीक्षण'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-5666871455153658411</id><published>2010-02-15T21:44:00.001+05:30</published><updated>2010-04-15T20:00:01.201+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><title type='text'>जो हूँ वैसा रहना</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S3lyvESxJfI/AAAAAAAAAl8/gE5GhWxhMRY/s1600-h/blog-ke-liye.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="179" src="http://1.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S3lyvESxJfI/AAAAAAAAAl8/gE5GhWxhMRY/s320/blog-ke-liye.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;मैं कल से क्यों नहीं डरता? मैं कल के बारे में क्यों नहीं सोचता? मेरी पत्नि अक्सर मुझ पर चिल्लाती है| चिल्लाए भी क्यों न वो, कल से जो डरती है, जिसके चक्कर में वो आज भी खो बैठती है। मुझे नहीं पता चला कब और कैसे मुझे आज से नहीं अब से प्यार हो गया। जो हूँ वैसा रहना मुझे पसंद है, चाहे सामने वाले को कितना ही बुरा क्यों न लगे। मुझे पल पल रूप बदलना नहीं आता। मैंने कहीं सुनना था या पढ़ा था सच और तलवार का घाव जल्द ठीक हो जाता है। उसके बाद झूठ का पल्लू पकड़ना बंद कर दिया, जबकि दुनियादारी झूठ के बगैर चलती नहीं।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt; पता नहीं कौन सी शक्ति है मेरे पीछे, जो मेरी दुनियादारी को सच के बलबबूते पर भी चलाए जा रही है। मैं कभी किसी चीज के पीछे दौड़ा नहीं, जो चाहिए वो सामने अचानक आ खड़ा हुआ और मुझे शक्ति देकर गायब हो गया या कह लो मुझमें समा गया। पिछले साल रिलीज हुई आमिर खान की फिल्म थ्री इड्टियस तो सबने देखी हो गई। सच में मैं मेरा सीना तब गर्व से फूल गया था, शरीर के भीतर एक अनोखी शक्ति महसूस की। जब इंटरव्यू देना आया रोस्तगी कहता है कि दो टाँग तुड़वाकर फिर से चलना सीखा हूँ, ये एटीट्यूट तो आते आते ही आएगा। मुझे पता है वो फिल्म थी, पर्दे पर ऐसा तो दिखाया जा सकता है, लेकिन मैंने तो इस असल जिन्दगी में अपना हुआ है अब से नहीं, तब से जब एक खेत छीनने पर पिता ने कहा था " कोई बात नहीं, बेटा खेत छीना है, कर्म तो नहीं"। उस दिन के बाद शायद कोई पल होगा जब मैंने कभी कहीं काम छूटने को लेकर अफसोस किया हो। मुझे याद है जब मैंने दैनिक जागरण छोड़ा था। मैंने एकाएक ही दैनिक जागरण को त्याग पत्र दे दिया, और बाहर निकल गया उस संस्थान से। सच में ऑफिस से पहले सीधा घर ही जाना था, घरवालों को बताना जो था कि बेटे ने नौकरी को ठोकर मार दी। सीढ़ियाँ उतर रहा था कि मोबाइल पर रिंग आई। बोले हैप्पी कहाँ हो? पंजाबी केसरी के लिए काम करोगे? उन्होंने कहा पैसे कितने लोगे? मैंने कहा, पैसे के लिए जॉब करनी होती तो दैनिक जागरण को ठोकर क्यों मारता, जो एक ही झटके में दो हजार रुपए बढ़ने के तैयार हो गया था। पंजाब केसरी में जॉब मिल गई और मैं खुश। डेढ़ साल बाद कुछ रिश्तों में खटास आने लगी। रिश्तों में खटास मुझे पसंद नहीं। जॉब छोड़ना बेहतर समझा, अच्छे रिश्ते रह जाएं इसलिए। जॉब छोड़ते ही फिर नई जॉब का ऑफर आ गया। फिर घर रहने की फुर्सत न मिली, स्वाभाव कभी नहीं बदला। चापलूसी हम से होती नहीं। कई जगहों से गुजरने के बाद वेबदुनिया ग्रुप में पहुंचा हूँ, यहाँ भी अपना स्वाभाव बरकरार है। जैसा हूँ वैसा रहना पसंद है। पिता की उस बात ने जिन्दगी को जीने का तरीका दे दिया। वरना मैं भी कल के चक्कर में अपना आज खो रहा होता। बहुत कुछ मिला है बिन माँगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;शायद चाहने वालों ने &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;एक जमाने बाद &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;खुशियाँ को मेरे घर का पता दे दिया।&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-5666871455153658411?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/5666871455153658411/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=5666871455153658411&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/5666871455153658411'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/5666871455153658411'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_15.html' title='जो हूँ वैसा रहना'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S3lyvESxJfI/AAAAAAAAAl8/gE5GhWxhMRY/s72-c/blog-ke-liye.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4948403734346783058</id><published>2010-02-06T15:38:00.001+05:30</published><updated>2010-04-15T20:00:24.954+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरी बेटी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जिन्दगी'/><title type='text'>मेरे घर आई नन्ही परी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20-z_kkWUI/AAAAAAAAAkE/PmdYZg_Jt4Q/s1600-h/Image0059.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20-z_kkWUI/AAAAAAAAAkE/PmdYZg_Jt4Q/s320/Image0059.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;छ: फरवरी 2010 को सुबह सात बजकर 58 मिनट पर हिम्मतनगर (गुजरात) स्थित अस्पताल वरदान में इस नन्ही परी का जन्म हुआ। एक झलक खुली खिड़की के पाठकों और मेरे दोस्त जनों के लिए। &lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20--6TcjRI/AAAAAAAAAkM/OJrYcy7LErA/s1600-h/Image122.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20--6TcjRI/AAAAAAAAAkM/OJrYcy7LErA/s320/Image122.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;फिलहाल नाम नहीं रखा गया, लेकिन मैंने उसको रिधम कहना शुरू कर दिया है। मेरे पास समय कम था, इसलिए दोस्त बस इतना सा लिख पा रहा हूँ।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4948403734346783058?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4948403734346783058/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4948403734346783058&amp;isPopup=true' title='48 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4948403734346783058'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4948403734346783058'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post_06.html' title='मेरे घर आई नन्ही परी'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/S20-z_kkWUI/AAAAAAAAAkE/PmdYZg_Jt4Q/s72-c/Image0059.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>48</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-2913262781196086294</id><published>2010-02-05T16:54:00.004+05:30</published><updated>2010-04-15T20:00:47.773+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मेरा गाँव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बच्चा'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>कीचड़ में खेलता वो मासूम सा बच्चा</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://image-photo.weather.com/16/1A/full/161A51AF-26C0-45C8-BFE8-308FA6956FC7.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://image-photo.weather.com/16/1A/full/161A51AF-26C0-45C8-BFE8-308FA6956FC7.jpg" width="224" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;एक फूल सा बच्चा, गली में खड़े पानी के कारण हुए कीचड़ के बीचोबीच मस्ती कर रहा है। उसको कितना आनंद महसूस हो रहा था, उसका तो अंदाजा नहीं लगा पाऊंगा। हाँ, लेकिन उसके चेहरे की खुशी मेरे दिल को अद्भुत सुकून दे रही थी।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt; उसको कीचड़ में उछल कूद करते देख, घर के भीतर से उसकी माँ ने आवाज दी, लेकिन वो अपनी मस्ती में मस्त कहाँ सुनने वाला था। तीन चार आवाजें लगाने के बाद उस मासूम की माँ और मेरे दोस्त के ततेरे भाई की पत्नि घर से बाहर आई, जो अपने बेटे से भी ज्यादा खूबसूरत थी, रूप-रंग नैन-नक्षों से, मगर दिल से नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने और उसके पति ने इस मासूम बच्चे की दादी को घर से बाहर निकाल दिया था, जो जवानी में विधवा हो गई थी, लेकिन ताउम्र इनको बड़ा करने के लिए जीती रही, बेरंग लिबासों में। जितनी खुशी उस मासूम को देखकर हुई, उतना ही दुख उसकी माँ के चेहरे पर बनावटी मुस्कान को देखकर हुआ, जो उसने मुझे देखते हुए दी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं कुछ घंटों बाद उसी रास्ते से फिर लौट रहा था, लेकिन वो मासूम फिर उसी तरह खेल रहा था, लेकिन अब उसको रोकने वाला कोई न था, क्योंकि उसकी माँ आंगन में खटिया लगाकर नींद का आनंद ले रही थी और वो मासूम बच्चा बाहर कीचड़ में आनंद ले रहा था। जिस कीचड़ में इस बच्चे को आनंद महसूस हो रहा है, उस कीचड़ में एक समझदार को आनंद प्राप्त नहीं हो सकता। ऐसा आनंद लेने के लिए तो बच्चा ही रहना होगा। जब मैं भी बच्चा था, मैं भी कीचड़ देखकर सूखी जमीन छोड़ देता था, कमल की तरह इस कीचड़ में खड़ा हो जाता, लेकिन मेरी माँ मुझे आवाजें न लगाती, उसको काम से फुर्सत न होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोगों ने कीचड़ को बुरा बना दिया, जिसमें बचपन का असली आनंद छुपा है, जिसमें कमल खिलकर अपने यौवन पर आता है। कीचड़ को वैसे ही बना दिया, जैसे शिव की बारात को। देखा जाए तो शिव की बारात भी एक अनुशासन का पाठ पढ़ाती है, अलग अलग लोग, लेकिन सब अनुशासन में चलते हैं। जिसे हम सब कह सकते हैं अनेकता में एकता। उस मासूम को कीचड़ में खेलते हुए आज भी महसूस कर सकता हूँ, उसके चेहरे की खुशी की एक झलक आज भी देखता हूँ। उसकी याद मन को खुशी के अहसास से इस तरह तर-बतर कर जाती है, जैसे नई इमारत को हम करते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-2913262781196086294?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/2913262781196086294/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=2913262781196086294&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2913262781196086294'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2913262781196086294'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='कीचड़ में खेलता वो मासूम सा बच्चा'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-1133318044921190246</id><published>2010-01-19T17:35:00.005+05:30</published><updated>2010-01-22T17:14:59.618+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया</title><content type='html'>मेरी आदत है कि कहीं से कोई भी सामान खरीदने से पहले अपना पर्स जरूर चैक करता हूँ, क्योंकि मेरी जेब में पैसे बच जाए, मानो बिल्ली के पास दूध। हाँ, जब कभी ऐसा करने में चूक जाऊं या फिर मुश्किल में फँस जाऊं तो माँ की दुआ ही बचाती है। सच में माँ की दुआओं में बहुत शक्ति होती है। मैंने तो उस शक्ति को हर पल महसूस किया है। बात है कल दोपहर की, जब मैंने दफतर की कैंटीन से हर रोज की तरह खाना मंगवाया। खाना आ गया, और खा भी लिया बड़े शौक से, लेकिन अब पैसे देने की बारी आई तो पर्स में से केवल पाँच पाँच के दो मरियल से नोट निकले, और बाकी सब नोट बड़े। अब कैंटीन वाले को देने थे 15 रुपए, मेरे पास खुले केवल दस रुपए। मैंने कैंटीन मालक से दस रुपए देते हुए कहा कि बाकी के पाँच रुपए शाम तक भेजवाता हूँ, वो जानता था कि पैसे आ जाएंगे, कहीं नहीं जाएंगे। अब वहां से उसका अहसान लेकर ऑफिस में आ गया। फिर शुरू हो गई कीबोर्ड की धुनाई, जैसे धोबी कपड़ों की और लुहार लोहे की धुनाई करता है। उंगलियों ने चलना धीमा कर दिया, मतलब कहने लगी हों कि अब बस थोड़ा सा आराम ले लेने दो। मैंने उंगलियों की थकावट को दूर दौड़ाने के लिए, उनसे कसरत करवाई। इतने में मेरा हाथ मेरी छाती पर आ गया। और उसने कुर्ते की ऊपर वाली जेब में एक कागज के होने का अहसास महसूस किया, मेरे दिमाग के हुकम पर उंगलियाँ मेरी जेब के भीतर घुस गई, वहां से एक कागज निकला, लेकिन ये कागज नहीं था, बल्कि दस का नोट था। जो धुलाई के बाद गुचपुच हो गया था। उस नोट को देखते ही माँ याद आ गई। माँ की दुआ याद आ गई। मैं कभी नहीं भूला कि एक दफा माँ ने कहा था कि तुम पैसे रख रख भूलोगे। सच में ऐसा मेरे साथ कई दफा हुआ, मैं कपड़ों में पैसे रखकर भूल गया, और बुरे वक्त पर वो ही पैसे मेरे काम आए, सच कहूँ तो डूबते को तिनके का सहारा मिल जाता है। जैसे किसी खिलौने को देखकर बचपन की याद ताजा हो जाती है, वैसे ही माँ की कही कोई बात सामने आते ही, माँ के दर्शन हो जाते हैं। वो कई साल पहले इस दुनिया से तो विदा हो गई, लेकिन अपने बेटे के साथ वो कदम दर कदम आज भी चलती है। वो माँ की गोद ही है, जहाँ जाकर हर डर गायब हो जाता है। सच कहूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मुझे जब कभी डर लगा,&lt;br /&gt;मैंने माँ की गोद में सर रख लिया।&lt;br /&gt;डर छूमंत्र हुआ पल में &lt;br /&gt;जब माँ ने सर पर हाथ रख दिया।।&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-1133318044921190246?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/1133318044921190246/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=1133318044921190246&amp;isPopup=true' title='17 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1133318044921190246'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1133318044921190246'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/01/blog-post_19.html' title='जब मुश्किल आई, माँ की दुआ ने बचा लिया'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-924516912810165249</id><published>2010-01-10T07:35:00.003+05:30</published><updated>2010-02-01T08:52:24.541+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रेम कहानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जब प्यार हुआ मुझे'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>जब प्यार हुआ मुझे</title><content type='html'>यही दिन थे (मई-जून), वेबदुनिया में आए अभी छ: महीने हुए थे। घर से कभी बाहर नहीं निकला था, इसलिए इन दिनों मैंने वेबदुनिया छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन कहते हैं ना कि समय से पहले और किस्मत से ज्यादा किसकी को कुछ नहीं मिलता, ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ, मुझे भी मेरे शहर वापिस जाना नहीं मिला, और इंदौर का होकर रह गया, पता नहीं कितने समय के लिए। हां, अगर उस वक्त मेरे प्रोजेक्ट लीडर मुझे न रोकते तो शायद में आज आपके सामने यह बातें पेश न कर पाता। मुझे पैसे ने नहीं बल्कि उनके स्नेह ने रुकने के लिए मजबूर किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आम दिनों की तरह अगले दिन ऑफिस में आया, और उसी पुराने अंदाज में सबको नमस्ते, सत श्री अकाल, नमस्कार और गुड मार्निंग कहा, मुझे नहीं मालूम था कि मेरा यह स्टाइल किसका दिल चुरा लेगा, वेबदुनिया ने उन दिनों कई भाषाओं में पोर्टल शुरू किए थे, जिसके चलते नए नए चेहरों की भर्ती हो रही थी, इनमें एक चेहरा था, जो मेरे राज्य से न था, जो मेरी मां बोली को नहीं बोल सकता था, और नाहीं मैं उसकी भाषा और उसके राज्य से पराचित था। पर कहते हैं प्यार की कोई भाषा नहीं होती, जब दिल मिलते हैं तो सब फासले खत्म हो जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी उसके साथ बहुत ज्यादा बातचीत नहीं होती थी, केवल नमस्ते और गुडमार्निंग बुलाने के सिवाय, हां कभी कभी जब वो ज्यादा काम में व्यस्त होती थी तो मैं इतना जरूर कहता था, क्या हुआ गुजारतन आज ज्यादा ही व्यस्त हो, इसके अलावा शायद हमारी एक ढाबे पर काफी लम्बी बातचीत हुई थी, तब दोनों की बीच में ऐसा कुछ नही था। बस रिश्ता था तो एक साथ कंपनी में काम करते हैं। मैं उन दिनों प्यार करने से कतराता था, क्योंकि घर में बापू की लठ से डर लगता था, क्योंकि वह अक्सर कहते थे, हैप्पी तू अपनी मर्जी से दुल्हन लेकर आएगा, और मेरी तेरी उस दिन लठ से पिटाई करूंगा, वो मुझे बहुत स्नेह करते थे, मैं भी उनसे। मगर मैं कहता था, जिस लड़की को मेरी मां चुनेगी, वो ही मेरी दुल्हन होगी, क्योंकि मैं अपनी मां से बेहद प्यार करता था और करता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी बातों का किला उस समय ढह गया, जब मैं एक रात आफिस से काम कर रात के बारह बजे घर की तरफ अपनी मस्ती में गीत गाते हुए अकेला जा रहा था, ऐसे में अचानक मेरे मोबाइल पर एक अनजाने से नम्बर से एक मैसेज आया, मैंने दिमाग की सारी जासूसी इंद्रियां दौड़ाई, मगर मुझे याद नहीं आया कि यह नम्बर किसका है, मैंने मैसेज रिटर्न कर पूछा 'हू', तो आगे से जवाब आया लड़की, मुझे लगा कोई मेरा दोस्त मुझे बना रहा है, उसके रोमांटिक मैसेज लगातार आते रहे है, मैंने उसको कहा, अब मुझे सोने दो, सब मैसेज भेजना, क्योंकि मैं ठहरा आफिस प्रेमी और अगले दिन जल्दी आफिस आना था। उसने मेरी बात मान ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर अगले दिन फिर उसके हैरत में डालने वाले मैसेज आए, और मैं तंग परेशान हो रहा था, सब की मुसीबतें हल करने के लिए आगे रहने वाला हैप्पी आज खुद मुसीबत में था, इतने में मैंने वो मैसेज अपने एक अन्य दोस्त को दिखाया तो उसकी अकल के घोड़े दौड़े, उसने फटाक से कहा कि यह तो किसी गुजराती ने भेजा है, वो लड़की अब भी मेरे जेहन में न थी, मैं अब भी अपने गुजराती दोस्त परुण पर शक कर रहा था, लेकिन दिन गुजारते जैसे ही रात हुई तो तंग करने वाले का पर्दाफाश हुआ, मैंने फोन लगाया, तो आवाज मेरी पहचान में आ गई, हंसते हंसते मैंने उससे पूछा, तुम क्यों मुझे तंग कर रही हो, क्या चाहती हो? तो आगे से जवाब हंसते हंसते आया कुछ नहीं, बस दोनों ने काफी समय तक बात की और वो लड़की मेरे प्यार के मक्कड़जाल में फंस गई, प्यार हुआ और कुछ महीनों के बाद शादी हुई, हमने घरवालों को बिना बताए दोस्तों की मदद से शादी कर ली, जब इस बात का खुलासा हुआ तो दोनों घरों में खलबली मच गई, इसके बाद हमारी प्रेम कहानी में ट्विस्ट आ गया, उसके बाद जो हुआ आपको फिर कभी बताऊंगा, जब मैं जोश में लिखने के मूड मैं हुआ।। तब तक के लिए मुझे इजाजत दें।।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-924516912810165249?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/924516912810165249/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=924516912810165249&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/924516912810165249'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/924516912810165249'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/01/blog-post_10.html' title='जब प्यार हुआ मुझे'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4371102373485404943</id><published>2010-01-03T22:43:00.002+05:30</published><updated>2010-01-19T00:23:14.195+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मित्र'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्कूल के दिन'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>इम्तिहानों के दिन और फिल्म चस्का</title><content type='html'>बचपन गुजर चुका था, और हम किशोर अवस्था से युवास्था की तरफ दिन प्रति दिन कदम बढाते जा रहे थे। ये उन्हीं दिनों की बात है। हम सब दोस्त एक कमरे में बैठकर इम्तिहानों के दिनों में पढ़ाई करते थे। पढ़ाई तो बहाना होती थी सच पूछो तो मौज मस्ती करते थे। कभी दलजिंदर के चौबारे में तो कभी कलविंदर की बैठक में...रोज रात को पढ़ाई के बहाने महफिल जमती थी। वो जट्ट सिख परिवार से संबंध थे और उन सब के बीच मैं एक पंडितों के परिवार से होता था। हम हैं पंडित, लेकिन रहनी सहनी (जीवनशैली) बिल्कुल जट्टों जैसी है। जट्ट परिवार से संबंधित जितने भी दोस्त थे, वो पढ़ने लिखने में तो बिल्कुल नालायक.. उनके मन में एक बात घर कर चुकी थी कि जट्ट पुत्र तो खेतों के लिए बने हुए और उनको डिप्टी कमिश्नर तहसीलदार तो बनना नहीं। मेरा परिवार गरीब था, इसलिए मुझे किसी न किसी तरह पढ़ाई पूरी कर नौकरी हासिल करनी थी। इसलिए उन सब में सबसे ज्यादा नम्बर लाने वाला मैं ही होता था, वो सब के सब नक्लची।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनको किताबों पर छापे हुए अक्षर तो पहाड़ों जैसे लगते थे, जिन पर फतेह पाना उनके लिए साँप की बिल में हाथ डालने जैसा था। एक रात हम सबको कुलविंदर की बैठक में पढ़ने के लिए जाना पड़ा क्योंकि शनिवार रात को फिल्म आती थी, इसलिए दलजिंदर की माँ बोली "आज तुम कुलविंदर के घर जाओ और वहां पर टीवी नहीं है"। सब चुपचाप कुलविंदर के घर आ गए और पढ़ाई में लग गए। पल्ले तो किसी के कुछ पड़ने वाला नहीं होता था लेकिन फिर भी मजबूरन किताबों के साथ माथा पच्ची करनी पड़ती थी क्योंकि मुझे जो पढ़ना होता था। मैं पढ़ाई करूंगा तो वो कैसे मौज मस्ती कर सकते हैं। मैं मस्ती में पढ़ रहा था...मुझे नहीं पता था कि सब का ध्यान घड़ी की सूईयों की तरफ लगा हुआ है। जैसे ही नौ बीस हुए तो बोले यार फिल्म तो अच्छी आने वाली है और चल देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने सोचा अब कहां से जाएंगे ? उधर, सब सो चुके होंगे और किसका दरवाजा खटखटाएंगे ? तो दलजिंदर बोला भुपिंदर चौबारे में सो रहा है और वो पक्का फिल्म देख रहा होगा। हम बोले वो तो सबको बता देगा और सबको कल सुबह गालियां पड़ेंगी। तो दलजिंदर बोला वो तो देखते देखते टीवी सो जाता और आज भी सो गया होगा पक्का। फिर सवाल आया चौबारे तक पहुंचेंगे कैसे? तो कलविंदर बोला...गुरनाम के घर के साथ लगती दीवार से कूदकर घर से बाहर निकल जाते हैं और टोटी के घर वाली दीवार से होते हुए दलजिंदर के चौबारे तक पहुंच जाएंगे। उधर, मेरा मन डर रहा था कि कहीं किसी ने देख लिया तो कल बेटा काम से गया क्योंकि दीवार के उस पार मेरे घर का दरवाजा बिल्कुल सीधा पड़ता था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सबके कहने पर पहले दीवार पार की और फिर चोरों की तरह घर की पिछली दीवार से छत तक पहुंचे और धीरे धीरे चौबारे में प्रवेश किया। वहां पर दलजिंदर वाली बात सच हुई, भुपिंदर गाढ़ी नींद में सोया हुआ था और टीवी चल रहा था। हम सबने फिल्म देखी..लेकिन बीच बीच में जब कोई जबर्दस्त सीन आता तो गुरनाम बिंदर की आवाज निकल जाती...इस आवाज ने रात को तो कोई हंगामा खड़ा नहीं किया, लेकिन सुबह मरवा दिया। आवाज दलजिंदर की मम्मी ने सुन ली थी। जब अगली सुबह मैं उनके घर गया तो उसकी मम्मी ने पूछा क्या रात तुम लोग फिल्म देख रहे थे? तो मैंने साफ साफ कह दिया हां देखी थी, पर आपको कैसे पता चला? उन्होंने कहा कि गुरनाम के बोलने की आवाज आ रही थी। इस बाद उन्होंने कुछ नहीं कहा और मैं वहां से कलटी मार गया। इसके बाद कानों को हाथ लगाए...ऐसा रिस्क नहीं लेना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अगर और पढ़ने की इच्छा है जी तो &lt;/b&gt;: &lt;a href="http://window84.blogspot.com/2009/03/blog-post_4946.html"&gt;जब यारों के लिए लिखे प्रेम पत्र&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4371102373485404943?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4371102373485404943/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4371102373485404943&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4371102373485404943'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4371102373485404943'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2010/01/blog-post.html' title='इम्तिहानों के दिन और फिल्म चस्का'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8458466924996728051</id><published>2009-12-21T08:20:00.001+05:30</published><updated>2010-01-16T09:43:23.580+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शौचालय'/><title type='text'>शौचालय और बेसुध मैं</title><content type='html'>मुझे वो दिन कभी नहीं भूलता। उस दिन मैं काम कर कर बेसुध हो चुका था। मेरा शरीर गतीविधि कर रहा था, जबकि मेरा दिमाग बिल्कुल सुन्न हो चुका था, क्योंकि काम कर कर दिमाग इतना थक चूका था कि उसमें और काम करने की हिम्मत न थी। मैंने अपनी कुर्सी छोड़ी, और टहलने के लिए नीचे के फ्लोर पर चला गया, जहां चाय और कॉफी बनाने वाली मशीन लगी हुई थी। मैंने एक कप चाय ली, और घुस गया साथ वाले रूम में, जो बिल्कुल खाली था। सोचा कि एकांत है, कुछ समय यहां पर रहूंगा तो तारोताजा हो जाऊंगा। मैंने चाय का कप एक टेबल पर रखा, और पेसाब करने के लिए बाथरूम में चला गया।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं बाथरूम के भीतर गया और पेसाब करने लगा। जब मैं पेसाब कर रहा था, मुझे कुछ ऐसा लगा जो 'गलत' था। जो इससे पहले कभी मेरे साथ नहीं हुआ था। आज मुझे पेसाब करने के लिए पैरों की उंगलियों के बल होना पड़ रहा था। लेकिन आज तक तो ऐसा न हुआ था। मैंने सोचा कि पागल कारीगर ने पेशाब करने वाला बेसिन कितना ऊंचा लगा दिया। मुझे से छोटे कद वाले इस ऑफिस में बहुत लोग हैं, उनको कितनी मुश्किल आती होगी पेसाब करने में। इसकी शिकायत किसी ने शिकायत क्यों नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या प्रोजेक्ट लीडर ने भी इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया? जिसका कद तो बहुत छोटा है। इतना सोच सोचते मैंने कैसे न कैसे पेशाब कर लिया। पेशाब करने बाद जैसे ही मैंने अपनी कम्प्यूटर की स्क्रीन पर काम कर कर थकी हुई आंखों को खोला, तो मेरी निगाह सामने लगे आईने पर गई। फिर क्या था आंखें खुली की खुली रह गई, दिमाग चित हो गया। गुम हुए होश लौट आए। मैंने देखा कि जिसमें मैंने पेशाब किया, वो पेशाब करने का नहीं हाथ धोने वाला वाश बेसिन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहां पर मुझे ऐसी हकरत करते हुए देखने वाला कोई नहीं था, सोचो अगर वो सार्वजनिक होता तो...। इसके बाद मेरी हैरानी की कोई हद न रही, मुझे उस दिन अहसास हुआ कि काम का बोझ आदमी को किस तरह बेसुध कर देता है। इस घटना का केवल मुझे पता था, लेकिन मैं सोच रहा था कि अगर इतनी बड़ी गलती यहां हो गई तो काम में भी कुछ न कुछ तो हुई हो गई। और कोई गलती न हो। इसलिए मैं ऑफिस से घर के लिए निकल दिया। ये बात करीब दो साल पहले की है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8458466924996728051?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/8458466924996728051/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=8458466924996728051&amp;isPopup=true' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8458466924996728051'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8458466924996728051'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html' title='शौचालय और बेसुध मैं'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-2562904374182459227</id><published>2009-12-11T11:02:00.002+05:30</published><updated>2010-01-19T00:24:24.197+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='railway satation'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kulwant happy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><title type='text'>मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://dailyhoopla.com/wp-content/uploads/phoenix.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="200" src="http://dailyhoopla.com/wp-content/uploads/phoenix.jpg" width="173" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;कुछ दिन पहले मैं अहमदाबाद के रेलवे स्टेशन पर खड़ा बठिंडा को जाने वाली रेलगाड़ी का इंतजार कर रहा था, मैं खड़ा था, लेकिन मेरी नजर इधर उधर जा रही थी, लड़कियों को निहारने के लिए नहीं बल्कि कुछ ढूंढने के लिए, जो खोया भी नहीं था। इतने में मेरी निगाह वहां पर स्थित एक किताब स्टॉल पर गई, मैं तुरंत उसकी तरफ हो लिया, जब पत्नी साथ होती है तब मैं खाने पीने के अलावा शायद किसी और वस्तु पर पैसे खर्च कर सकता हूं, इसलिए हर यात्रा के दौरान मुझे किताबें या मैगजीन खरीदने का शौक है। इस बार मैंने अपने इस सफर के लिए 'आह!जिन्दगी' को चुना, मैंने जब उसको खोला तो मैं सबसे पहले उस लेख पर गया, जो महान फुटबाल खिलाड़ी माराडोना पर लिखा गया था, इसको लेख को पढ़ते हुए मुझे मेरे पिता का अतीत याद आ गया, उनका संघर्ष याद आ गया।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;वो माराडोना की तरह फुटबालर नहीं हैं, वे तो आम इंसान हैं। इस लेख में माराडोना की तुलना एक ऐसे पक्षी (फीनिक्स) के साथ की गई थी, जो अपनी ही राख से पुन:जीवित हो उठा है, इस तुलना ने मुझे मेरे पिता के संघर्ष के उन दिनों की याद दिला दी, जब वक्त ने कहा, "अब तो हेमराज खत्म हो गया", लेकिन वे फिर से इस कल्पित पक्षी की तरह खड़े हुए और जुट गए। इस लेख में माराडोना के बारे में लिखा था, लेकिन मुझे मेरे पिता का संघर्ष ही याद आ रहा था, मुझे लगा कि शायद इस लेख को मेरे लिए लिखा गया। मेरे पिता का जन्म एक बड़े पंडित परिवार में हुआ, लेकिन उनके पिता की बे-वक्ती मौत ने उनको दर दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर दिया, लालची लोगों ने उनका सोना(जायादाद) कौड़ियों का भाव खरीद लिया। खुद के गांव में रहकर काम करने की बजाय मामा के गांव चले गए, कई साल वहां रहे, लेकिन खुद के लिए कुछ नहीं, मामा के बच्चों के लिए कई एकड़ जमीन तैयार कर दी, जब जवान हुए तो हाथ में कुछ ही जमीन बची।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उस जमीं पर खेती शुरू की तो कुछ साल बाद मां को बेटे का मोह आने लगा, उन्होंने मेरे पिता को शहर बुला लिया, चलो तीनों भाईयों की तरह इसको भी सरकारी नौकरी पर अटक दें, लेकिन किस्मत देखो, तीन बार सरकारी नौकरी मिली और चली गई। सबको चिंता हो रही थी, अब क्या होगा, बच्चे बढ़े हो रहें और शहर में तो महंगाई बहुत ज्यादा है। लेकिन सरकारी नौकरी से ऊब चुके मेरे पिता ने अब पशु व्यापार शुरू कर दिया, घर में अच्छे पैसे आने लगे, लग रहा था कि अब दिन सुनहरे आ गए, बुरा वक्त टल गया, मगर बुरा वक्त कहां टलने वाला था, वो तो बड़ा हाथ मारने का इंतजार कर रहा था। मुझे आज भी याद है वो दर्दनाक हादसा, जिसमें एक ट्रक्टर, तीन दोस्त और कई भैंसे खोई मेरे पिता ने, उनकी भी टांग टूट गई थी। सारी कमाई इस हादसे ने छीन ली, और तो और कई महीनों के लिए बिस्तर पर लिटा दिया गया मेरे पिता को, टेंशन फिर से बढ़ गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ महीनों बाद फिर से बिस्तर छोड़ा और निकल गए कुछ नए जुगाड़ की तरफ, उनको फिर से एक सरकारी नौकरी पर लगा दिया गया, लेकिन काम जमा नहीं, उन्होंने उसको ठोकर मार थी, बस फिर क्या? पूरे परिवार की बातों को अनसुना करते हुए चल दिए उस गांव की तरफ, जहां कभी उनकी जमीनें हुआ करती थी, और आस पास के गांवों में उनके पिता और दादा के नाम का डंका बजा करता था, लोग आज भी याद करते हैं मेरे दादा की घोड़सवारी को। इस गांव में सिर्फ सौ रुपए और एक दो महीनों का राशन लेकर पहुंचे मेरे पिता, शहर में चिंता थी कि अब इसका होगा क्या? इसको खेती के लिए वहां जमीं कौन देगा। लेकिन एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खुलता भी है। इस गांव में मेरे पिता को उनके चचेरे भाई की जमीं 50-50 पर करने के लिए मिल गई और कुछ जमीं हमने ठेके पर ले ली। जो जमीं हिस्से (50-50) पर मिली थी, वो जमीं ठीक ठीक थी, लेकिन मेरे पिता की मेहनत ने उसको सोना बना दिया। जब वो सोने में तब्दील हो गई तो चचेरे भाई का दिमाग खराब हो गया, मन में लालच आ गया, वो हिस्से पर देने के बजाय ठेके पर देने की बात करने लगा, लेकिन उसने ठेका इतना बोला कि पूरे गांव में उतना ठेका किसी जमीं का न था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने वो जमीं छोड़ दी, गुस्सा आ रहा था, लेकिन मेरे पिता की जिन्दगी में धोखे ही धोखे लिखें हैं, ये तो मैं अच्छी तरह जानता हूं। अगर वो जीवनी लिखें बैठे तो शायद ही कोई अपना होगा, जिसने उसके साथ धोखा न किया हो, शायद उन लोगों में मेरी मां सबसे पहले आएगी, जिसने अंतिम सांसों तक मेरे पिता को धोखा नहीं दिया। इसके बाद एक और जमीं हिस्से पर मिली, जो सोना होते हुए भी पित्तल के भाव बिक रही थी, इस जमीं का मालक एक सीधा सादा साधारण व्यक्ति था, जिसको दुनियादारी नहीं आती थी, बस नशा खिलाओ, जो मर्जी पाओ। उसकी पत्नी थोड़ी समझादार थी, उसने कहा कि अगर बाबा आप मेरे खेतों में काम करना चाहते हैं तो मुझे खुशी हो गई। शायद गांव छोड़ने से पहले हमको उस घर का भला करना ही था, ये मेरे गांव में अंतिम साल थे। मेरे पिता ने हां कह दिया, लेकिन लोग मुझे पकड़ पकड़ कह रहे थे, तेरे पिता को बोल, वो जमीं कचरा है, और कचरे में हीरे मोती नहीं मिलते। मेरे पिता मेरी कहां मानने वाले थे, वो मुझे और मजदूरों को लेकर जुट गए काम में, उनको विश्वास था कि वो इसको सोना बना देंगे, अगले साल वो ही हुआ, जो जमीं गांव के लोगों के लिए कचरा थी, वो आज सोना हो चली थी, सब को इंतजार था कि ये लोग जमीं कब छोड़ेंगे और हमको कब मिलेगी। सबको इंतजार था, मेरे द्वारा गांव छोड़ने का, क्योंकि मुझे अगर शहर में नौकरी मिल गई तो स्वाभिक है कि मेरे पिता मेरे साथ आएंगे। ऐसे में इस जमीं को वो लोग ठेके पर ले लेंगे, लेकिन खेत की मालिकन नहीं चाहती थी कि हम गांव छोड़कर जाएं, क्योंकि उसके घर में खुशियां फिर से लौट आई थी, उसके उतरे हुए चेहरे की रंगत फिर लौट आई थी, मगर मैं उस गांव में कैसे रुकता, मेरे पिता की जमीनें तो लोग खा चुके थे। ऐसे दूसरों के खेतों में मर मर कमाई करने से क्या होने वाला था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मां की मौत के बाद मेरे पिता भी शहर आ गए, तीन साल पहले। वो यहां भी अपना ही काम शुरू करने वाले थे, लेकिन घर परिवार वालों ने कहा कि जो तुम्हारे पैसे हैं, वो तुम को खर्च ने के लिए नहीं मिलेंगे, क्योंकि तुम्हारी बेटी की शादी करनी बाकी है। अब वो फिर मुश्किल में आ गए, मामा ने उनको एक नौकरी पर लगवा दिया, जिसको लेकर मैंने एतराज जताया, वो नौकरी करने लायक नहीं थी, और तो और मामा ने यहां तक कह दिया कि मालक को मत बताना तुम मेरे जीजा हो। इस बात ने मेरे पिता के मन और दुखी कर दिया। फिर क्या, उनके भीतर का फीनिक्स फिर जिन्दा हो गया और अगले छ: महीनों में मेरे पिता ने अपना नया ट्रैक्टर ट्राली लाकर खड़ा कर दिया, जो अब चल रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'});BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''});BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84});&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-2562904374182459227?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/2562904374182459227/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=2562904374182459227&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2562904374182459227'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2562904374182459227'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/12/blog-post.html' title='मेरे पिता और पक्षी फीनिक्स'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-3749356521542785543</id><published>2009-10-23T16:32:00.004+05:30</published><updated>2010-01-19T00:24:57.264+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kulwant happy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण-पार्ट-2</title><content type='html'>आज वो बैंक भी बदल गया और मेरा बैंक खाता भी। वो बैंक अब एचडीएफसी हो गया जो कभी बैंक ऑफ पंजाब हुआ करता था, मेरा खाता भी अब इस बैंक में आ गया। वो वाला नहीं नया बैंक खाता, वो तो बहुत पहले ही बंद हो गया था, लेकिन वो पहला बैंक खाता मुझे आज भी याद है। उस बैंक में चैक लगाने और पैसे निकलवाने के लिए जाना। कतार में लगना, उस मैडम को देखना, जो मुझे कतार में लगे हुए देखती। कभी कभी कैश काउंटर पर वो भी आ जाती, बस उस दिन काम थोड़ा जल्दी हो जाता..आम दिनों के मुकाबले।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;जब उस मैडम तक मुझे कोई काम आ जाता तब बहुत मुश्किल होती। वो मुझे घंटों तक अपने सामने बिठाकर रखती दस मिनट दस मिनट कहते कहते वो घंटों निकाल देती। और कुछ भी न बोलती, बस सामने बैठे इस ग्राहक को देखती दस मिनट कहने के बहाने। वो असीम खूबसूरत थी, चेहरे पर नूर तो गजब का था। कोई भी देखे पहली नजर में मर मिटे। शायद उसका बस चलता तो वो मुझे महीने-दर-महीने अपने सामने रखे रखती उसके सामने पड़े कम्प्यूटर की तरह। वो कोई मुझसे बदला ले रही थी या जानबूझकर वो मुझको बस देखना चाहती थी। ये बात न तो उसने कभी बताई और न मैंने पूछी। पूछकर मैं मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता, एक बार भूल से ले बैठा था,  तो उसने ऑफिस में पकड़कर चुम्मा ले लिया था मेरा। जी हां, ये बैंक वाली मैडम के बाद की घटना है, जिस ऑफिस में मैं काम करता था, उस ऑफिस का इंचार्ज या खर्चवाहक आशिक मिजाज था, वो नई नई लड़कियों को रोजगार के बहाने अपने ऑफिस में रखता। एक दिन मैं ऑफिस में अकेला था, खबरें बना रहा था। मैंने वहां डेस्क पर बैठी एक 32 साला महिला से पूछा तुम मुझे इस तरह क्यों देखती हो। मैं तुम्हें बुरा लगता हूं या अच्छा। इतना कहते हुए मैं पानी पीने के लिए सीट से उठा, उसने आएं देखा न बाएं। बस वहां से खड़ी हुई और मुझे पकड़कर किस कर डाला। वो तो भगवान का शुक्र के ऑफिस के शीशे काले थे, वरना बाहर बस स्टॉप पर खड़े लोग देख लेते तो मुसीबत हो जाती। इस लिए मैंने किसी भी महिला को कभी नहीं पूछा कि वो मेरे बारे में क्या सोचती है। वो मुझे क्यों निहारती है। मैंने कभी नहीं कहा 'क्यों'। क्योंकि उत्तर तो मिल ही चुका था उक्त घटना से। उसके बाद कई अंटियां निहारती रहती, लेकिन मैंने मुड़कर क्यों नहीं कहा और कहना भी नहीं चाहूंगा। ऑफिस के साथ एसटीडी थी, वहां पर बहुत सारी महिलाएं फोन करने आती, वो मेरे ऑफिस में तांकती रहती, उस दरवाजे से जो एसटीडी और ऑफिस को एक करता था। वहां पर एक कॉल गर्ल भी आती थी, आती तो बहुत सारी थी, लेकिन वो मुझे याद है। एक दिन उसने मुझे ही छेड़ दिया। मैंने एसटीडी वाले से कहा यार तुम दरवाजा बंद रखा करो। नहीं तो मुश्किल हो जाएगी। वो कहने लगा कि समुद्र में रहकर मछलियों से परहेज अच्छा नहीं। तुम हैंडसम हो..तुम्हारे पास मौके आते हैं। मैं कहता था, मुझे मौके नहीं चाहिए। मैं हमेशा भागता हूं ऐसे मौकों से। इस ऑफिस में नौकरियां दिलवाने का काम भी चलता था। उस दिन नौकरी दिलाने वाली लड़की नहीं आई, जिसका काम मुझे करना पड़ा । एक महिला आई नर्स की ज़ॉब के लिए, जो कभी नाचने गाने का काम करती थी। मुझे नहीं पता था कि वो ऑफिस इंचार्ज की ही भेजी है। अगर पता होता तो सतर्क रहता। वो ऑफिस में आई। उसके कपड़े मल्लिका शेरावत जैसे। मुझे बोली चलें। मैंने कहा चलो। डाक्टर इंतजार कर रहा है। बोली मोटरसाइकल पर चलते हैं। मैंने कहा नहीं, पास में ही है पैदल चलते हैं। मैं उसके आगे आगे ऐसे चल रहा था, जैसे वो मेरे पास आकर मुझे मार डालेगी। उसने फिर कहा साथ साथ चलते हैं। मैंने कहा कि कोई बात नहीं। तुम आओ। वहां डाक्टर के पास पहुंचे तो वो ऐसे बैठी वहां। जैसे वो जॉब के लिए नहीं जिस्म का नुमाइश लगाने आई हो। उसकी माऊंट एवरेस्ट की तरह उभरी हुई छाती देखकर डॉक्टर हैंग हो गया, मेरे ऑफिस वाले कम्प्यूटर की तरह। बातचीत खत्म हुई तो हम बाहर आए। मुझे बोली जॉब पक्की समझूं। मैंने मन में कहा कि आंखों का डाक्टर है, अगर इसको रख लिया तो हॉस्पिटल को ताला जल्द ही बजेगा। मैंने कहा कि कल से काम पर आ जाना, उसके बाद अंतिम फैसला होगा। फिर बोली मैं भी तुम्हारे साथ तुम्हारे ऑफिस में काम करने लग जाती हूं, तुम कितने खूबसूरत दिखते हो। मैंने कहा बेटा फिर फँस गया। उसके बाद मैंने अपने खर्चवाहक को फोन लगाया, ये क्या माल भेज दिया। कोई शो नहीं करवाना, वहां नर्स की जरूरत है। मल्लिका शेरावत की नहीं। डाक्टर ने उसको दूसरे दिन ही निकाल दिया, डाक्टर ने नहीं उसकी पत्नी ने। इसको रखकर क्या उसने अपना घर बर्बाद करना था। वो फिर मेरे ऑफिस आई उसने कहा मेरी जॉब चली गई, मैंने कहा ये तो होना ही था।&lt;a href="http://window84.blogspot.com/2009/10/blog-post.html"&gt;...पार्ट-1&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'});BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''});BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84});&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-3749356521542785543?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/3749356521542785543/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=3749356521542785543&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/3749356521542785543'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/3749356521542785543'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/10/2.html' title='महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण-पार्ट-2'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' 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आकर्षण ज्यादा रहा है। अगर आज मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे बहुत सी महिलाएं याद आती हैं, जिनका मेरे प्रति आकर्षण था, हर आकर्षण का मतलब शारीरिक संबंधों से नहीं होता। मुझे याद आ रहे हैं वो बचपन के दिन, जब मैं दारेवाला गाँव में स्थित अपने घर के बाहर मिट्टी में खेल रहा होता था और घर के भीतर मां काम में जुटी होती थी। जब मैं मिट्टी के साथ मिट्टी हो रहा होता, तो वहां से सिर पर घास की गठड़ी उठाएं जो भी महिलाएं गुजरती, वो मुझे बुलाकर एवं छेड़कर गुजरती, इतना ही नहीं कुछ तो मुझे अपनी उंगली पकड़ाकर अपने घर तक ले जाती, और मैं भी निश्चिंत उनके साथ चल देता।&lt;br /&gt;&lt;a name='more'&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार तो मेरे गुम होने की अफवाह भी उड़ गई थी, अफवाह इस लिए कह रहा हूं क्योंकि मैं गुम हुआ ही नहीं था, मैं तो किसी के घर में ऊंट के साथ खेल रहा था। उधर, मेरे घरवालों ने आसपास के तीन गांवों की तलाशी ले ली, लेकिन अपने गांव को भूल गए। तब सब थक हारकर घर में आ गए तो किसी ने कहा कि तुम्हारा छोरा तो उस महिला के साथ मैंने जाते देखा था। जब उनके घर पहुंचे तो पता चला कि शैतान तो यहां ऊंट के साथ खेल रहा है। थोड़ा सा आगे बढ़ता हूं तो मुझे चौथी कक्षा वाली वो टीचर याद आती है, जो मुझको गोद में लेना चाहती थी, जो मुझे पढ़ाकर लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहती थी, अगर अन्य महिलाओं को मुझसे लगाव था तो मेरी माँ का लगाव कैसे कम हो सकता है। आखिर वो भी एक महिला थी। मेरी मां ने मुझे चौदह साल तक अपने साथ सुलाया, कभी न नुक्कर नहीं की। मैं सबसे ज्यादा मां के करीब रहा हूं, मैंने ही अपने बहन भाईयों में से सबसे ज्यादा मां का दूध पिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल के समय लड़कियों के आकर्षण का केंद्र तो मैं हमेशा से ही बना रहा है, उससे भी दिलचस्प बात मुझे याद आती है कि कोई सुंदर जवान टीचर भी मुझे ज्यादा समय तक अपने सामने बैठने नहीं देती थी, जब मैं नौवीं कक्षा में था, तो एक टीचर ने यहां तक कह दिया था कि तुम सबसे पीछे बैठा करो, मैंने पूछा कौन मैडम जी, उन्होंने कहा कि मेरे ध्यान किताब पर केंद्रित नहीं हो पाता, इसका मतलब मैं कुछ भी नहीं समझा, आखिर क्यों उसका ध्यान डोल जाता है। आपको हैरानी होगी कि इस टीचर ने जब कई साल बीतने के बाद मेरी अखबार में छप्पी फोटो देखी तो फटाक से बोली शायद इस लड़के को मैं जानती हूं, जाने भी कैसे ना..ध्यान जो भटका देता था, ये फोटो इसलिए नहीं छप्पी थी कि मैं कोई चोर लुटेरा गैंग में शामिल हो गया था, बल्कि तब मैं दैनिक जागरण में काम करता था, और पाठकों को गिफ्ट प्रदान करते हुए फोटो खिंचवाने पड़ते थे। मैंने उपर 'हैरानी होगी' शब्द इसलिए इस्तेमाल किया क्योंकि शिक्षकों को स्टूडेंट याद नहीं रहते। इसका भी कारण है क्योंकि उनका कोई एक स्टूडेंट नहीं होता, हजारों स्टूडेंट होते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लड़कियों की लिस्ट लम्बी है, इसलिए उनको की बात न करते हुए, एक और महिला की बात करता हूं, जब मैंने छोटे से शहर से बड़े शहर की तरफ कूच किया तो एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। मुझे सबसे ज्यादा नफरत बार बार बैठकें बुलाने से होती है, तब तो खासकर जब आप एक ही मुद्दे को बार बार दोहरा रहे हों। इस कंपनी में मुझे निरंतर कई बैठकों में भाग लेना पड़ा, मैं तो एक ही मुद्दे से तंग आ जाता हूं, इसलिए मैं सामने वाले को देखकर बैठक में टाईम पास करने लगता हूं, या फिर उसकी मूर्खता पर मन ही मन में मुस्कराता हूं, जिसके कारण मेरी आंखों में एक अजब सी चमक आ जाती है, शायद किसी लड़की को आकर्षित करने के लिए वो चमक होनी बहुत जरूरी होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैठक चल रही थी शायद 12वीं बैठक थी जो एक ही मुद्दे पर थी, और एक ही उसको संबोधन करने वाला, मुझे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर मूर्ख कौन है वो कि हम? इतने में बैठक को संबोधन कर रही महिला ने बीच में रुकते हुए कहा कि तुम मुझे इस तरह मत देखो, मैं हाजिर जवाबी हूं, मैंने तुरंत कहा कि ठीक है अगली बार काला चश्मा पहनकर आऊंगा, अब उसके पास कोई जवाब नहीं था, वो भी कोई कम आकर्षित करने वाली चीज तो न थी, अगर आप किसी सुंदर चीज देख नहीं सकते, तो दुनिया में आने का कोई फायदा नहीं और उस वक्त जब आपको कोई मुफ्त में समय दे रहा है। लेकिन उस कंपनी में वो ही एक ऐसी महिला थी, जिसने मुझे फोन करके अच्छे डॉक्टर को दिखाने के लिए कहा। ये तब की बात है, जब मैं एक दिन बिमार होने के कारण ऑफिस से घर की तरफ जा रहा था, और किसी का फोन नहीं आया, जबकि अगले दिन सबने पूछा अब कैसे अब कैसे हो?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक और किस्सा याद आ रहा, छोटा करके सुनाता हूं। मैं अब भी उसी बड़ी कंपनी में काम कर रहा था कि अचानक एक दिन रास्ते में मुझे एक लड़की ने रोका और शुरू हो गई। सब उगल दिया जितना जहर उसके मन में कंपनी के प्रति भरा हुआ था, मैं हैरान था कि इस लड़की ने ऑफिस में कभी चाय का कप तक शेयर नहीं किया और आज एकदम से मुझे बीच रास्ते शुरू पड़ गई क्या इसको डर नहीं लगता कि मैं ऑफिस वालों को उसकी सारी बात बता दूंगा। शायद वो मुझे पहचान चुकी थी कि मैं तो एक बागी किस्म का लड़का हूं। जब आपको कोई हर रोज नोटिस करता है तो वो आपको आपसे ज्यादा जानने लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी मकान मालिकन कहती है कि तुम को रिश्तों की कदर नहीं, लेकिन फिर भी मैं तुम्हारी ज्यादा इज्जत करती हूं। मुझे इस बात की समझ भी नहीं आई, जब मुझे रिश्तों की कदर नहीं, अगर मुझे समाज की समझ नहीं, अगर मुझे कोई समझ नहीं तो वो मेरी इज्जत क्यों करे। शायद उसका मेरे प्रति आकर्षक ही उसको मेरी इज्जत करने के लिए मजबूर करता है, लेकिन मैं फिर दोहरा रहा हूं कि आकर्षण का मतलब सदैव शारीरिक संबंधों से नहीं होता। और होना भी नहीं चाहिए, फूल हमको आकर्षित करते हैं क्या हम उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश कर सकते है? सुंदर चीजें हमेशा आकर्षित करती हैं, लेकिन मैं खुद को सुंदर नहीं कह रहा, हो सकता है कि सामने वाली निगाहें ही सुंदर हो, जिनको मैं हमेशा ही सुंदर दिखाई देता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue;"&gt;&lt;b&gt;मुझे कुछ और महिलाएं याद आ रही हैं...इस लिए एक और किश्त जल्द जारी करूंगा।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'});BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''});BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84});&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-1279950597949706911?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/1279950597949706911/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=1279950597949706911&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1279950597949706911'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1279950597949706911'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='महिलाओं का मेरे प्रति आकर्षण'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/Ss7JEpQ4qnI/AAAAAAAAAR0/48C4E53kXc0/s72-c/c-pic1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7497935766285492839</id><published>2009-09-20T07:40:00.000+05:30</published><updated>2009-09-20T07:40:20.955+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टी-शर्ट'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>मेरी दस नंबरी टी-शर्ट</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWO85NbnCI/AAAAAAAAARc/LIGlBd4Phrs/s1600-h/untitled_1_copy2.jpg" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWO85NbnCI/AAAAAAAAARc/LIGlBd4Phrs/s320/untitled_1_copy2.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;मुझे टी-शर्टों से बेहद प्यार था, मुझे टी-शर्ट और जींस पहना शुरू से ही अच्छा लगता है, लेकिन आजकल टी-शर्ट पहना कम हो गया, क्योंकि मेरा पेट बाहर आ गया है। जब मैंने वेबदुनिया को ज्वॉइन किया, तो मुझे पता चला कि वेबदुनिया में ऑफिस ड्रेस रूल हैं, लेकिन मैं बंदा बिंदास। कुछ दिन तो सोचा कि कंपनी बड़ी है, शायद रिर्सोसेज से बढ़कर रूल बड़े हों।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर कुछ दिनों बाद मेरी निगाहें कंपनी के एक सीनियर एवं पुराने अधिकारी पर पड़ी, जो नियम के उलट उस दिन टी शर्ट पहनकर आया हुआ था। मैं अपनी सीट से उठा और उससे पूछा क्या। सर रूल केवल नए रिर्सोसेज के लिए हैं, सबके लिए। उन्होंने कहा, नहीं सब के लिए एक ही रूल हैं। मैंने कहा आज शनिवार नहीं, और आप फॉर्मल कपड़े पहनकर नहीं आए। उन्होंने कहा, मैंने तुमको कब कहा, तुम फॉर्मल पहनकर आओ। बस फिर क्या था, मेरा वो ही पुराना राग शुरू हो गया। टी-शर्ट और पेंट। मेरे इस लुक को लेकर कुछ लोग तो मुझे टी शर्ट बॉय कहते भी थे, खासकर निहारिका पांडे, जो आजकल श्रीमति अनिल पांडे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मुझे वेबदुनिया की ओर से शुरूआती तीन दिन का वेतन मिला, तो उसके कैश होती ही। मैंने एक टी शर्त खरीदने की सोची। मैं टी-शर्ट खरीदने के लिए एक बड़े शोरूम के भीतर गया, मैंने एक टी-शर्ट देखी। मुझे वो पसंद आ गई, मेरी सब से बड़ी कमजोरी कोई पसंदीदा चीज लेने के लिए मोल तोल नहीं करता, जब मैंने वो टीशर्ट देखी तो मुझे बहुत पसंद आ गई। बस मैंने बोला इसको पैक कर दो। मुझे लगा कि इसकी कीमत दो ढाई सौ रुपए होगी। मगर जब बिल बनकर तैयार हुआ तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गई। बिल पर लिखे थे साढ़े चार सौ रुपए। मैंने चुपचाप टी शर्ट लेकर वहां से निकलने की सोची।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWOo8nzvFI/AAAAAAAAARU/UKwupsnyPNM/s1600-h/Image0431.jpg" imageanchor="1" style="margin-left: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWOo8nzvFI/AAAAAAAAARU/UKwupsnyPNM/s320/Image0431.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;उसके बाद मैंने उसको कम से कम दो साल तक पहना, लेकिन मेरी पत्नी को अब वो अच्छी नहीं लग रही थी, मेरे शरीर के बिगड़े स्टक्चर के कारण। उसने फाड़ दी, और वो पोचा बनकर मेरे घर का फर्श साफ करती है। बेचारी दस नंबरी मेरी टी-शर्ट।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'});BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''});BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84});&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7497935766285492839?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/7497935766285492839/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=7497935766285492839&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7497935766285492839'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7497935766285492839'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/09/blog-post_20.html' title='मेरी दस नंबरी टी-शर्ट'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SrWO85NbnCI/AAAAAAAAARc/LIGlBd4Phrs/s72-c/untitled_1_copy2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4720978767745903223</id><published>2009-09-18T14:41:00.004+05:30</published><updated>2010-01-19T00:29:57.672+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='श्राद्ध'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रिश्वत'/><title type='text'>श्राद्ध खिलाने के लिए खिलाओ रिश्वत</title><content type='html'>आज मैंने भी अपनी मां का श्राद्ध पाया, लेकिन खुद ही घर में खाया। सचमुच! यकीन नहीं आता होगा न। मुझे भी यकीन नहीं आ रहा था क्योंकि मां को पूर्वजों की रोटी खिलाते हुए देखा, किसी गरीब घर के बच्चों या परिवारजनों को। आज मेरी पत्नी बोली हम किसी पंडित पंडितायन आदि को खिलाने की बजाय मंदिर बाहर बैठे हुए भूखे नंगे लोगों को श्राद्ध की रोटी खिलाएंगे ताकि मां खुश हो सके। आखिर होममिनिस्टर के आगे हमारी कहां चलती है, वो हड़ताल पर चली या अस्तीफा देकर चली गई तो अपनी तो नैया डुब जाएगी। मैंने कहा ठीक है, उसने पूरी और खीर बनाई। मुझे भरकर एक बर्तन में खीर दे दी। मैं और मेरा तेतेरा भाई खीर पूरी लेकर मंदिर पहुंचे। हम बांटने ही लगे कि वहां बच्चों की फौज लिए बैठी एक महिला बोली, ये नहीं खाएंगे, तुम पैसे दे सकते हो। मैंने बोला, चल किसी और को खिला देते हैं। वहां गया, उस महिला ने खीर पत्तल में डलवा तो ली, लेकिन खीर बाद में वहां पर ऐसे गिर रही थी जैसे गिलास से पानी। फिर मेरी नजर एक बुजुर्ग व्हील चेयर पर बैठे साधुनुमा व्यक्ति पर पड़ी, जब उसको मैंने पूछा बाबाजी पूरी खीर खाओगे। कोई जवाब नहीं आया। इतने में वहां एक और युवक आया और मेरी तरह ही बोला। बाबा ने उत्तर दिया, दक्षण दोगे, वो पहले तो चुप हो गया। फिर दुबकी आवाज में हां बोला। इधर, बाबा ने फटाक से उच्ची आवाज में कहा क्यों नहीं खाएंगे? पहले दक्षण हो जाए। मैं चकित रह गया। फिर मैंने सोचा शायद बाबा पहले किसी सरकारी दफ्तर में था, शायद इस लिए काम के लिए पहले रिश्वत मांग रहा है। अब तो श्राद्ध खिलाने के लिए भी रिश्वत देनी पड़ती है।&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'});BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''});BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84});&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4720978767745903223?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4720978767745903223/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4720978767745903223&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4720978767745903223'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4720978767745903223'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/09/blog-post_18.html' title='श्राद्ध खिलाने के लिए खिलाओ रिश्वत'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7715325153461629379</id><published>2009-09-13T18:23:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:30:18.718+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>जब छोड़कर चली गई मां</title><content type='html'>मुझे आज भी याद है, वो काला दिन, जब मेरी मां ने सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर अपनी मां (मेरी नानी) की बांहों में दम तोड़ दिया था। उस दिन मेरी मौसी, मामी, मेरी नानी और मैं, गुलूकोज की बोतल का खत्म होने का इंतजार कर रहे थे, उस पर निर्भर था मेरी का मां जीवन। मेरी मां की तबीयत बहुत नाजुक थी, और डाक्टर ने सुबह उसको देखने के बाद मुझे बोल दिया था, हैप्पी अगर वो इस गुलूकोज की बोतल को पचा गई तो मैं उसको बचालूंगा। सबकी नजरें उस बोतल थी, और मेरी मां भी अब सुबह से बेहतर लग रही थी, उसके सिर के पास बैठी मेरी नानी कह रही थी, देख शिमला (मामी) कृष्णा के चेहरे पर पहले सा ताब नजर आ रहा है। मुझे यकीन है कि कृष्णा आज शाम तंदरुस्त होकर घर पहुंच जाएगी। वहां सब एक दूसरे का मन रख रहे थे, वैसे नानी के कहने अनुसार मेरी मां के चेहरे पर पहले जैसा ताब था, वो पहले से बेहतर होती नजर आ रही थी। और इधर गुलूकोज की बोतल खत्म होने पर ही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस सुबह की बात ही है, जब मैं ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था, तो मेरी मां बोली। हैप्पी मेरी तबीयत खराब हो रही है, तुम मुझे आज सरकारी अस्पताल में दिखाकर आओ, मैंने कहा मां कल तो दवाई लेकर आए हैं, जिससे दवाई लाए थे वो बठिंडा का मशहूर जाना माना डाक्टर है। नहीं, हैप्पी मुझे तुम एक बार सिविल अस्पताल दिखा लाओ। वहां तुम्हारी जान पहचान के डाक्टर हैं, इलाज अच्छे से कर देंगे। मैंने कहा ठीक है। और वो आंखों में आंसू लेकर बोली, आज मुझे अपने घर छोड़ आना, जो हमने शहर में नया बनवाया था, गांव से शहर आने के लिए। मैं आज से वहां ही रहूंगी, तेरे पापा को गांव से आना हो या ना। लेकिन अब मैं गांव वापिस नहीं जाउंगी। मैंने कहा ठीक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं मां को लेकर अस्पताल पहुंचा, डाक्टर ने जांच करने के बाद कहा, इसको अस्पताल में दाखिल करना पड़ेगा, मैंने कहा ठीक है। अस्पताल में दाखिल होने की बात सुनकर अस्पताल में मेरी नानी, मामी और बुआ सब पहुंच गए, मैं और मौसी तो पहले से वहां पर थे। अब उसको गुलूकोज की बोतल लगाने की बात आई, तो वहां नर्स और अन्य डाक्टर हाजिर हो गए, किसी को मेरी मां के शरीर में नस नहीं मिल रही, वो जगह जगह सूईयां चुभ रहे थे, शायद यहां कोई नस मिल जाए। मैंने कभी मां को टीका लगता नहीं देखा, आज वो मेरे सामने उसके जिस्म में सूइयां चुभो चुभोकर देख रहे थे, जैसे किसी मुर्दे के शरीर में। मेरे मुंह से गाली निकल गई, डाक्टर मेरे जानकार थे, उन्होंने कहा हैप्पी तुम बाहर जाओ। आखिर डाक्टरों को नस मिली, वो भी टखने के उपर। अब मुझे थोड़ा सा सुकून आया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोतल आधी खत्म हो चुकी थी, और मेरी मां के चेहरे पर सुधार के संकेत साफ साफ नजर आ रहे थे। उसने कहा हैप्पी तुम परम (छोटी बहन) टैनी (बड़ा भाई) का रखना। उसने कहा मां पानी...मामी मौसी ने झट से नानी को पानी पकड़ा और मुंह में डालने लगी कि मेरी मां को अटैक आया, और दांत जुड़ गए। पानी की एक घुंट भी अंदर न गई। और सब खत्म हो गया। 28 फरवरी 2006 शाम पांच बजे मेरी माँ इस दुनिया को अलविदा बोलकर...और कुछ जिम्मेदारियां मेरे कंधों पर डोलकर चली गई।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;script src="http://www.netvibes.com/js/UWA/load.js.php?env=BlogWidget2" type="text/javascript"&gt;&lt;/script&gt;&lt;br /&gt;&lt;script type="text/javascript"&gt;var BW = new UWA.BlogWidget({moduleUrl:'http://www.netvibes.com/modules/feedReader/feedReader.php?feedUrl=http%3A%2F%2Fpunjab84.blogspot.com%2Ffeeds%2Fposts%2Fdefault'});BW.setPreferencesValues({'nbTitles':'2', 'view':''});BW.setConfiguration({'title':'ਸੱਗੀ-ਪਰਾਂਦਾ', 'height':84});&lt;/script&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' 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Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-2051992396446713642</id><published>2009-08-28T11:26:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:34:06.984+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>जब मिल बैठे तीन यार, मैं, मुकेश और गीत</title><content type='html'>गुरूवार का दिन और मैं पूरी तरह मुकेशमयी हो चुका था। सुबह सुबह तो मैंने &lt;a href="http://kulwant84.blogspot.com/2009/08/document.html"&gt;श्री मुकेश को श्रद्धांजलि &lt;/a&gt;देते हुए पोस्ट लिखी। और उसके बाद मैंने इंटरनेट पर उसके गीतों को सर्च किया..और फिर डाउनलोड किया। फिर मुकेश के गीत सुनता गया और उसमें रमता गया। इन गीतों को जितनी शिद्दत के साथ लिखा गया है, उतनी ही शिद्दत से मुकेश ने इन गीतों को गाया..तभी तो सुनते ही कानों को आराम सा मिल जाता है। मैंने मुकेश के इन गीतों को कई दफा सुना और इनको अपने चुनिन्दा गीतों में शामिल भी किया हुआ है, लेकिन तब मैं नहीं जानता था कि इन गीतों को आवाज देने वाला मुकेश दा...कहते हैं कि जब तब आपके भीतर जिज्ञासा नहीं होती, तब तक आप अपने पास पड़े कोहिनूर को भी चमकीला कांच ही समझते रहते हैं। मेरे भीतर आज तक कभी ऐसी जिज्ञासा पैदा ही नहीं हुई थी कि पार्श्व गायकों के बारे में जानूं या फिर ये गीत किसने गाया इस बात पर ध्यान दूं। बस गीत अच्छा है, सुनो और लुत्फ उठाओ। बेशक विविध भारतीय वाले अपने गीतों के साथ साथ उनके गायक और गीतकार का नाम निरंतर बताते रहते हैं। हिन्दी हिंदुस्तान में कितने ही एफएम आ जाएं, लेकिन विविध भारती वो स्थान है, जहां दिल को चैन-ए-आराम मिलता है। जिस पर बजने वाले गीतों को सुनने के बाद कान ये नहीं कहते कि कानों से उतार फेंक दो एयरफोन...मन करता है कि विविध भारतीय को निरंतर सुनते रहो..विविध भारतीय आज और कल दोनों को साथ लेकर चलता है। मैं भी कहां चला गया...बात तो मुकेश की कर रहा था...हां मैंने कल कुछ गीत सुने...और उन गीतों से कुछ निकालकर एक नोटपेड पर लिख लिया..ताकि वो आप तक लिखित रूप में पहुंच सकें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं दूर जब दिन ढल जाए&lt;br /&gt;सांझ की दुल्हन बदन चुराए&lt;br /&gt;चुपके से आए..&lt;br /&gt;मेरे ख्यालों के आंगन में &lt;br /&gt;कोई सपनों के दीप जलाए............दीप जलाए&lt;br /&gt;कहीं दूर जब दिन ढल जाए...........&lt;br /&gt;इस गीत के बोल जितने दिलकश हैं, उतनी ही दिलकश आवाज में मुकेश ने गाया है, और शलिल चौधरी की धुन भी लाजवाब है। ये गीत दिल को इस तरह छूता है कि आप साथ साथ गुनगुनाने से रह ही नहीं सकते, हो सकता है कि गुनगुनाते हुए आप ऐसे माहौल में पहुंच जाते हैं जहां आपको शांति एवं ताजगी महसूस होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आवारा हूं आवारा हूं &lt;br /&gt;या गर्दिश में हूं  &lt;br /&gt;आसमां का तारा हूं&lt;br /&gt;घरबार नहीं &lt;br /&gt;संसार नहीं &lt;br /&gt;मुझसे किसी को प्यार नहीं &lt;br /&gt;उस पार किसी से मिलने का एकरार नहीं &lt;br /&gt;मुझसे किसी को प्यार नहीं &lt;br /&gt;इंसान नगर अनजान डगर का प्यारा हूं&lt;br /&gt;आवारा हूं आवारा हूं&lt;br /&gt;आवारा हूं आवारा हूं &lt;br /&gt;या गर्दिश में हूं  &lt;br /&gt;आसमां का तारा हूं&lt;br /&gt;आबाद नहीं बर्बाद सही&lt;br /&gt;गाता हूं खुशी के गीत मगर&lt;br /&gt;जख्मों से भरा है सीना है मेरा &lt;br /&gt;हँसती है मगर ये मस्त नजर&lt;br /&gt;दुनिया मैं तेरे तीर का या तकदीर का मारा हूं&lt;br /&gt;आवारा हूं आवारा हूं &lt;br /&gt;या गर्दिश में हूं  &lt;br /&gt;आसमां का तारा हूं&lt;br /&gt;इस गीत को बहुत पहले मैंने विविध भारती पर सुनना था, और तब से इस गीत को मैंने अपने मनपसंद गीतों में शामिल कर लिया था। जिस रेडियो पर इसको सुना था वो आजकल बठिंडा से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक ताजे बठिंडा के ऑफिस में पड़ा है। वहां युवा तो इतना नहीं सुनते लेकिन वहां मेरे एक अंकल है, जिसको रेडियो सुनना बेहद पसंद है, इसलिए जब मैंने ऑफिस छोड़ा तो वो मैंने उनके लिए छोड़ दिया। आज के धूम धड़ाके वाले कान फोडू म्यूजिक में वो आनंद नहीं जो पुराने संगीत में था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन के सफर में &lt;br /&gt;तन्हाई &lt;br /&gt;मुझ को तो न जिन्दा छोड़ेगी&lt;br /&gt;मरने की खबर ए जाने जिगर &lt;br /&gt;मिल जाए कभी तो मत रोना. ..&lt;br /&gt;हम छोड़ चले हैं महफिल को&lt;br /&gt;याद आए कभी तो मत रोना&lt;br /&gt;इस दिल को तसल्ली दे देना&lt;br /&gt;दिल घबराए कभी तो मत रोना&lt;br /&gt;इस गीत को सुनते हुए ऐसा लगता है कि मुकेश अब रोए अब रोए...क्योंकि पूरा गीत गम से लबालब है। अंतिम अंतरा लिखते हुए शायद लिखने वाले की आंखों में भी आंसू तो आए होंगे। एक तो गीत दर्द भरा और उपर से मुकेश की दर्द भरी आवाज का सहारा मिल गया। जब दो एक जैसी चीजें एक दूसरे में समाती हैं तो कुछ नया एवं लाजवाब निकलता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-2051992396446713642?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/2051992396446713642/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=2051992396446713642&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2051992396446713642'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2051992396446713642'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/08/blog-post_27.html' title='जब मिल बैठे तीन यार, मैं, मुकेश और गीत'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4932585905045364556</id><published>2009-08-21T10:23:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:35:45.892+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><title type='text'>खून से लथपथ पिता जब घर पहुंचे</title><content type='html'>सुबह के चार बजे घर का दरवाजा किसी द्वारा खटखटाने की आवाज आई और मेरी मां दरवाजे की तरफ दौड़ी, क्योंकि आधी रात के बाद से वो मेरे पिता का इंतजार कर रही थी, जिसको ढूँढने के लिए मेरे परिवार के सदस्य गए हुए थे। ऐसे में अगर हवा भी दरवाजा खटखटा देती तो भी स्वाभिक था कि मेरी मां दरवाजे की तरफ इसी तीव्र गती से दौड़ती क्योंकि अचानक मांग का सिंदूर कहीं चल जाए तो साँसें भी अटक अटक आती हैं। ऐसा ही कुछ हाल था मेरी मां का उस दिन। मेरी मां ने जैसे ही दरवाजा खोला तो देखा के खून से लथपथ एक व्यक्ति खड़ा है, ये व्यक्ति कोई और नहीं मेरे पिता जी थे। शहर की गलियां पानी से भरी हुई थी तो मेरे पिता के कपड़े रक्त से। मां पिता की ये स्थिति देखते ही दंग रह गई, जैसे पांव से जमीं छू मंत्र हो गई हो, गले से जुबां ही गायब हो गई हो। मेरी मां को लगा आज या तो ये कैसी को मौत के घाट उतारकर आएं हैं या फिर आज किसी ने इनके शरीर को हथियारों के प्रहार से छलनी कर दिया। बिन शोर मचाए चुपचाप बाजूओं के सहारे मेरी मां पिता को कमरे के भीतर ले आई, यहां मैं और मेरी छोटी बहन घोड़े बेचकर सोए हुए थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://kulwant84.blogspot.com/2009/08/blog-post_20.html"&gt;&lt;b&gt;एक सोच पर प्रतिबंध कहां तक उचित ?&lt;/b&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब मेरी मां ने पिता का कुर्ता उतारा तो उसकी आंखें खुली की खुली रहेगी। गले में सांसें अटक गई। अब तो मां पत्थर में तब्दील हो चुकी थी, क्योंकि पिता के शरीर की हालत देखते किसी की भी वो हालत हो सकती थी, जो मेरी मां की हुई। पिता के जिस्म पर एक नहीं दस ग्यारह जोक चिमटे हुए थे, जो शरीर से जुदा हुए लोथड़ों की तरह प्रतीत हो रहे थे। जोक तो एक भी बुरी, क्योंकि जोक इंसान का पूरा खून पी जाती है और मेरे पिता के शरीर पर दर्जन भर जोकें थी। मेरी मां ने हिम्मत जुटाते हुए सभी जोकों को एक एक कर उतारा..और जख्मों पर हल्दी तेल में लिप्त रूई के गोले रखे। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर ऐसे मेरे पिता के साथ हुआ कैसे ? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात कुछ इस तरह है कि उन दिनों हम बठिंडा शहर में रहते थे। हमारे पास ट्रैक्टर हुआ करता था जो ठेकेदारी के काम पर चलता था। और उन्हीं दिनों शहर में तीन से चार फुट तक पानी भर गया। शहर का पूरा जनजीवन अस्त व्यस्त हो गया। हमारे लिए जनजीवन अस्त व्यस्त होना कोई मायने नहीं रखता था क्योंकि हम बच्चे तो बारिश के पानी में कागज की नाव छोड़कर उसके डुबने का मंजर देखते थे। शहर को पानी के चुंगल से निजात दिलाने के लिए हमारे ट्रैक्टर को भी अन्य ट्रैक्टरों के साथ शहर का पानी नहर में फेंकने के लिए नहर किनारे लगा दिया गया। जहां एक तरफ गहरे गहरे खतरनाक खतान तो दूसरी तरफ बहती नहर। बीच में हमारा ट्रैक्टर चल रहा था। रात का समय था, तो पिता जी को पीने का शौक था। उस रात भी उन्होंने पी ली..जिसके बाद पता नहीं क्या हुआ? वो वहां से निकल गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब रात को उनको देखने उनका एक अन्य साथी वहां पहुंचा तो देखा कि ट्रैक्टर चल रहा है, मगर हेमा कहीं नजर नहीं आ रहा तो उसने काफी आवाजें लगाई। सामने से कोई उत्तर नहीं आया और चारों ओर पानी फैला हुआ था। ऐसे में उसको लगा कि हेमा कहीं पानी में बह गया, वो व्यक्ति घर की तरफ दौड़ा। उसने मेरी मां और पूरे परिवार की नींद उड़ा दी। सब मेरे पिता को ढूंढने के लिए निकल गए। वो कहां किसी को मिलने वाले थे, सब उनको तीन चार फुट पानी में पैदल चलकर ढूंढ रहे थे और वो पता नहीं कहां कहां से होते हुए घर पहुंच गए। पर उनके शरीर पर लगी जोकें बयान करती थी कि वो मौत को मात देखकर आएं और खतानों के बीच से आएं हैं। जब सुबह बिस्तर से पिता जी उठे तो बोले मुझे क्या हुआ और ट्रैक्टर के पास कौन है? मेरी मां गुस्से में थी, उसने उस वक्त को चटपटा जवाब दिया जो मैं भूल गया शायद।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4932585905045364556?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4932585905045364556/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4932585905045364556&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4932585905045364556'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4932585905045364556'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/08/blog-post_20.html' title='खून से लथपथ पिता जब घर पहुंचे'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8375853123810562285</id><published>2009-08-16T21:30:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:34:28.940+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='childhood'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='kulwant happy'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='तोतली जुबान'/><title type='text'>तोतली जुबान से जब पिता को टोका</title><content type='html'>रात का समय था और हमारे घर मेरे पिता श्री अपने एक अन्य दोस्त के साथ बैठकर शराब का लुत्फ उठा रहे थे. मैं दूर खड़ा इस दृश्य को बड़ी गौर से देख रहा था, पता नहीं मुझे क्या हुआ, मैं उनके पास गया और बोला, अंकल जी अगर आप ने शराब पीनी है तो हमारे घर में मत आया करो.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे शब्द सुनते ही मेरे पिता एवं अंकल जी दंग रह गए, उन्होंने इधर उधर देखा, शायद वो सोच रहे थे कि मुझे यह बात कहने के लिए मेरी मम्मी ने भेजा है. अभी वो इधर उधर देख ही रहे थे कि इतने में मेरी मम्मी पड़ोस में रहने वाली मेरी भाभी के घर से आई. जैसे अंकलजी ने देखा कि मेरी मम्मी बाहर आ रही हैं तो वो हंसते हुए बोले अगर भाभी जी आप बाहर न होते तो मुझे लगता कि आप ने इसको समझाकर मेरे पास भेजा होगा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अंकलजी ने मुझे गोद में बिठाया और बोले ठीक है सरपंच आज के बाद घर से बाहर पिया करेंगे. इसके बाद मेरे पिता जी ने मेरी तारीफों के पुल बांधने शुरू कर दिए. मेरे पिता जी शराब पीकर अकसर मेरी तारीफ किया करते थे. मेरे पिता को मेरी याददाश्त पर बहुत गर्व था क्योंकि मुझे घर की हर चीज एवं हर बात याद रहती थी जो कि कभी कभी मेरे पिता को हैरत में डाल देती थी. जब उक्त घटना घटित हुई तब शायद मेरे चार वर्ष का था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8375853123810562285?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/8375853123810562285/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=8375853123810562285&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8375853123810562285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8375853123810562285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='तोतली जुबान से जब पिता को टोका'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-2734295632875327652</id><published>2009-07-31T13:11:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:30:52.877+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='railway satation'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='indore'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='friend'/><title type='text'>एक आंसू गिरा उसकी आंख से....</title><content type='html'>वो ही रेलवे  स्टेशन, वो ही रेलगाड़ी, पर कुछ बदलाव था इस बार। फर्क इतना था कि कभी इस गाड़ी से मैं आया था, और आज इस गाड़ी से कोई जा रहा था। जैसे परिंदे दाने चुगने के बाद अपने घरों की तरफ चल देते हैं, वैसे ही एक परिंदा आज यहां से उड़कर अपने घर जाने को तैयार था, बस देरी थी रेल गाड़ी छूटने की। सच में वो परिंदे नसीब वाले होते हैं, जिनको शाम ढले अपने बसेरे में पहुंचने को मिल जाता है, और कुछ बद-नसीब परिंदे जो बस उस दिन की बोट जोहते हैं, जिस दिन उनकी तकदीर बदले, और वो अपने वतन में, अपनों के बीच, अपनी जिन्दगी के कीमती लम्हे गुजारें। प्रवासी होने का गम बहुत बड़ा होता है, इसलिए इस बार दोस्त की विदाई के वक्त गम से ज्यादा खुशी थी कि वो अपने घर जा रहा है, अपनों के बीच। उन गलियों में, जिन गलियों को छोड़कर वो कभी इस जगह पहुंच गया था, जहां सिर्फ उसके पास नए दोस्त थे और कुछ अजनबी लोग। हम अप्रवासियों को भी अप्रवासियों का सहारा होता है, आज वो एक सहारा खत्म हो रहा था। रेलवे स्टेशन विदाई का वक्त, और सब ठहाके लगा रहे थे, शायद हँसी के तले गम छुपा रहे थे। गम तो होता ही जब को साथी चला जाए। वो भी हँसते हुए एसी कोच में चढ़ गई, गाड़ी वाले बाबू को क्या पता कि वो कितनों को बिछोड़कर लेकर जा रहा है और कितनों को अपनों से मिलाने के लिए। उसका तो काम है गाड़ी चलाना। गाड़ी अपने समय पर प्लेटफार्म से छूटी। वो हाथ हिलाते हुए दरवाजे से विदा ले रही थी, और रेलगाड़ी के साथ साथ हम से दूर जा रही थी, इतने में उसका हाथ उसका उसके चेहरे की तरह गया और फिर पीछे चला गया। इतने में वो आंखों से ओझल हो गई। मुझे नहीं पता, उसने हाथ नीचे की तरफ क्यों क्या किया, लेकिन&lt;br /&gt;मुझे ऐसा  लगा कि जो आंसू उसने दोस्तों  के बीच खड़े होकर विदाई के वक्त छुपाए थे, उनमें से उसकी आंख से के मोती सा आंसू रेल की पट्ड़ी पर जा गिरा। अगर ये सच हुआ तो मैंने उसकी आंख से एक आंसू गिरते देखा, लेकिन उसने कितने आंसू रेलवे की सीट पर गिराए होंगे, ये मैं नहीं जानता। इस सवाल का जवाब वो खुद लिखेगी, जब वो इस ब्लॉग को पढ़ेगी। जब वो इंदौर में आई थी, तब मेरे लिए बिल्कुल आजकल थी, मगर जब वो इंदौर से गई तो इतनी खास हो गई कि अगर कभी खुदा ने मौत से पहले पूछा बोल तेरी आखिरी ख्वाहिश क्या है, तो जुबां पर आने वाले नामों में इस दोस्त का भी नाम होगा। पता नहीं, तब मुझे शायद ये मेरा दोस्त याद रखेगा, या अपनी जिन्दगी में मस्त होकर मुझे सदा के लिए भुला देगा। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैंने तो इस दोस्त को सदा याद करने के लिए अपने ब्लॉग पर छोड़ दी दे लिखत...जब जब कोई प्रतिक्रिया भेजेगा..तब तब इंदौर और इस दोस्त की याद ताजा होती रहेगी। वैसे याद तो उनको किया जाता है, जिनको कभी भूले हों...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-2734295632875327652?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/2734295632875327652/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=2734295632875327652&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2734295632875327652'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2734295632875327652'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='एक आंसू गिरा उसकी आंख से....'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-2392040043875375153</id><published>2009-06-21T16:22:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:22:20.387+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><title type='text'>माँ छांव तो बाप कड़ी धूप</title><content type='html'>जब भी पिता ने हमको मारने की कोशिश की, मां बीच में दीवार बन खड़ी हो गई। हमारे तन पर पड़ने वाली लठें उसने अपने तन पर सही। हमारे बचाव में जब भी मां उतरती तो पिता के मुँह पर एक बात होती थी कि 'माँ बिगाड़ती है और पिता संवारता था'। पिता के इन शब्दों से मैं कुछ हद तक सहमत हूं, अगर सिर पर पिता के डर का साया न हो तो शायद बच्चे उतनी सीमा में नहीं रहते जितनी में रहना चाहिए। मुझे लगता है कि माँ हमारे अनुकूल बनती है, जबकि पिता हमको समाज के अनुकूल बनता था। माँ हमारी हर गलती को छुपाती है, लेकिन पिता उन गलतियों को छापने के बजाय उन गलतियों को दोहराने से रोकता है। मुझसे पता है कि मेरे पिता का स्वभाव बहुत गर्म था, जो अब उतना नहीं। लेकिन माँ स्वभाव में बिल्कुल इसके विपरीत थी। हम पिता से इतना डरते थे कि अगर वो आते दिख जाते तो हम खेलना छोड़कर घर के भीतर चले जाते। ये भी उनके भय के कारण ही हुआ, जो हम बुरी संगत से दूर रहें, स्कूल से कोई शिकायत लेकर घर नहीं आए। किसी लड़की के पीछे नहीं गए, किसी को सीटी बजाकर छेड़ा नहीं। जब ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चों को टीचर पीटते हैं तो वो शिकायत लेकर घर नहीं आते, अगर आते हैं तो सिर्फ माँ को बताते हैं, क्योंकि उनको पता होता है कि पिता को बताया तो वो सीधा स्कूल जाएंगे, इस लिए नहीं कि टीचर ने उनकए बच्चे को क्यों पीटा, बल्कि इस लिए जाएंगे कि आपने इसको और अच्छे से क्यों नहीं पीटा। अगर पिता को दूसरे नजरिए से देखें तो कहूंगा कि अगर माँ प्यार का सागर है तो पिता क्रेडिट कार्ड है। जिसके बल पर ऐश करने का अपना ही मजा है। जब हम सब पुत्र होते हैं तो हमको बाप की डाँट फटकार बुरी लगती है और माँ का दुलार भाता है। मगर जब हम अपने पिता वाली जॉब पर आते हैं तो हम वो ही करते हैं, जो हमारे पिता करते थे। अपने बच्चे की गलतियों को सुधारना और उनको फिर से न दोहराने के सीख देना आदि। तब जब हमारी पत्नियाँ हमारी माँ वाली ड्यूटी निभाती हैं तो हमको बुरा लगता है। जिन्दगी में जितनी माँ की अहमियत है, उतनी ही पिता की। हमारा माँ से लगाव इस लिए ज्यादा रहता है क्योंकि वो हमारी गलतियों को माफ करती है, वो हमारे अनुकूल रहती है। जबकि असल में पिता खून पसीने की कमाई से हमें सफल इंसान बनाने के लिए दिन रात काम करता है, ये काम ही हमको उनके अधिक करीब नहीं आने देता। लेकिन सत्य तो ये है कि अगर माँ छांव है तो पिता एक कड़ी धूप, जो हमको हर स्थिति का सामना करने के लिए हमको कठोर बनाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-2392040043875375153?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/2392040043875375153/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=2392040043875375153&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2392040043875375153'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/2392040043875375153'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='माँ छांव तो बाप कड़ी धूप'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8804684338554498631</id><published>2009-05-31T14:05:00.003+05:30</published><updated>2010-01-19T00:31:09.227+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>एक कश ने बिगाड़ दिए</title><content type='html'>&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SiJBemP1JoI/AAAAAAAAAEk/gceaDDV8Lhs/s1600-h/no+smoking.jpg" onblur="try {parent.deselectBloggerImageGracefully();} catch(e) {}"&gt;&lt;img alt="" border="0" id="BLOGGER_PHOTO_ID_5341904101933655682" src="http://4.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SiJBemP1JoI/AAAAAAAAAEk/gceaDDV8Lhs/s320/no+smoking.jpg" style="cursor: pointer; float: right; height: 320px; margin: 0pt 0pt 10px 10px; width: 247px;" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;कहते हैं कि एक कदम हमको मंजिल तक पहुंचता है तो वहीं धुएं का एक कश बर्बादी की डगर पर खींच ले जाता है, आम लोगों की तरह मेरे भी दोस्त थे, उनके पास समय बहुत था, तो एक दिन मस्ती मस्ती में, मजाक मजाक में किसी के कहने पर धुएं का एक कश ले लिया, फिर तो क्या कश पर कश का सिलसिला चल पड़ा, लेकिन वो मेरे सामने नहीं पीते थे। मेरे एक दोस्त को तो मेरे पिता ने धूम्रपान करते हुए खेत में देख लिया, और उसके बोले कि आज के बाद हैप्पी के साथ नजर मत आना, वो बोला आज के बाद नहीं पिऊंगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वो तो वहां से बचने का बहाना था, उसके बाद उनको सिग्रेट बीड़ी में भंग के पौधे से उतरा हुआ माल भरकर पीने की आदत पड़ गई। वो धूम्रपान का आदी हो चुका है, मुझे तब पता चला, जब उसका गुलाब से चेहरे पर छाइयां पड़ना शुरू हो गई। मैं अन्य दोस्त भी धूम्रपान के आदी है, इसबात का पता तब चला, जब मैं एक बार शहर से गांव गया था, और सुभाविक था कि मैं उनसे मिलने जाऊं, रात हुई तो मैं भी उनके साथ बस स्टैंड की तरफ टहलने निकल गया, वो मुझे किसे बहाने पीछे छोड़कर जाना चाहते थे, लेकिन मैं उनके कदमों से कदम मिलाता चल गया। वो दुकान पर पहुंचे, तो दुकानदार ने फटाक से सिग्रेट निकालकर दे दी, उनके बिन बोले, क्योंकि उसको पता था कि ये टोली सिग्रेट पीने आती है। उन्होंने ने पहले तो इंकार किया, लेकिन पीछे से आवाज आई रोज तो पीते हैं, आज हैप्पी के सामने भी पी लें। एक की तो कश ने जान भी ले ली, वो मेरे साथ कबड्डी खेला करता था, लेकिन उसके मां बाप ने उसको अच्छी पढ़ाई के लिए मंडी के बड़े स्कूल में भेजना शुरू कर दिया, जहां पर उसको सिग्रेट पीने की आदत हो गई। धीरे धीरे सिग्रेट में नशीले पदार्थ मिलाकर पीने की आदत पड़ गई। वो मेरा हम उम्र था, उसकी शादी कुछ साल पहले हुई थी और वो शादी के एक साल बाद भरी जवानी में इस दुनिया को छोड़कर रुखस्त हो गया।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8804684338554498631?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/8804684338554498631/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=8804684338554498631&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8804684338554498631'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8804684338554498631'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/05/blog-post_31.html' title='एक कश ने बिगाड़ दिए'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/SiJBemP1JoI/AAAAAAAAAEk/gceaDDV8Lhs/s72-c/no+smoking.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7706265679197478334</id><published>2009-05-10T10:46:00.002+05:30</published><updated>2010-01-19T00:31:28.735+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='माँ'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>मां से तोड़ आया अनजाने में रिश्ता...</title><content type='html'>यारों मैं इतना बुरा भी नहीं कि मां की कदर न करूं, मैं भी आपकी तरह मां से बहुत प्यार करता हूं और करता था एवं करता रहूंगा. लेकिन एक दिन अनजाने में उस मां से रिश्ता तोड़ आया, जब मुझे मालूम हुआ तो मैं बहुत रोया. हुआ कुछ इस तरह कि आज से तीन साल पूर्व जब मेरी मां ने सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर दम तोड़ा, तो कुदरती था कि उसका अंतिम देह सस्कार किया जाए. मेरी मां की आर्थी शमां घाट पहुंची, उसकी चिता को अग्नि के हवाले कर दिया. उसके बाद एक रस्म होती है कि मरने वाले की चिता के पास कुछ डक्के (लकड़ी की तीलियां) बिखरे पड़े होते हैं, सब लोग उन डक्कों को चुगकर वहीं रामबाग में तोड़ देते हैं और फिर वहां से चल देते हैं. वहां सबको देखादेखी मैंने भी वैसे ही डक्का तोड़ दिया और चिता की अग्नि पर फेंक दिया. कुछ दिनों बाद जब मुझे उस रस्म के पीछे का अर्थ पता चला तो बहुत दुख हुआ, उसका मतलब होता है कि अब हमारा मरने वाले से कोई नाता नहीं, हम इस डक्के के साथ उस रिश्ते को भी तोड़ रहें है, जो तुम्हारा हम से था. मुझे इस बात का दुख है कि मैं उस मां से रिश्ता तोड़ आया, जिसने नौ माह मुझे पेट में रखा, कई सालों तक सीने से लगाकर सुलाया, अपने सीने का दूध पिलाकर बड़ा किया, उंगली पकड़कर चलना सिखाया, मुझे बोलना सिखाया.बेशक उसकी हर बात मेरे साथ है, लेकिन उक्त बात का दुख मुझे हमेशा होता है, उस मैं उसके अंतिम सस्कार पर नहीं रोया, लेकिन वैसे याद कर अक्सर रोता हूं, अगर वो होती तो शायद ऐसा होता, घर जाता तो सीने से लगाती, प्यार करती, आंखों से वजन मापती..हाथों से खाना खिलाती...&lt;br /&gt;&lt;a href="http://punjab84.blogspot.com/2009/05/blog-post.html"&gt;ਹੁੰਦੇ ਨੇ ਦਿਲ ਦਰਿਆ ਮਾਂਵਾਂ ਦੇ&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7706265679197478334?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='enclosure' type='text/html' href='http://punjab84.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' length='0'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/7706265679197478334/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=7706265679197478334&amp;isPopup=true' title='11 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7706265679197478334'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7706265679197478334'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='मां से तोड़ आया अनजाने में रिश्ता...'/><author><name>Kulwant Happy  (Unique Men)</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04322255840764168300</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_cC0P6YH0kHE/TTgNwTKrC_I/AAAAAAAABEc/jOkTVq2CHA4/S220/kulwant%2BHappy%2Blogo.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-461462910655762267</id><published>2009-04-27T13:29:00.002+05:30</published><updated>2010-01-19T00:22:56.991+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पिता'/><title type='text'>मैं, मेरे पिता और तालिबान</title><content type='html'>कीबोर्ड की टिकटिक से कोसों दूर, अपने होमटाउन में पूरा एक महीना बीत किया. लेकिन तालिबान ने वहां पर भी पीछा नहीं छोड़ा. खबरिया चैनलों के कारण हर घर में तालिबान टीवी की स्क्रीन पर नजर आता है, लोगों के दिमागों पर ही नहीं छाया बल्कि लोगों की जुबां पर भी तालिबान शब्द चढ़ गया.इंदौर से मैं बठिंडा के लिए पिछले महीने निकला था, घर शाम को पहुंचा, घर में मेरे पिता जी और अन्य दो व्यक्ति बैठे हुए टीवी देख रहे थे, और उनके बीच बातें हो रही थी तालिबान की. मैं हैरान था कि जहां भी तालिबान की बातें, तो इतने में टीवी पर आ रही एड खत्म हुई तो एक न्यूज एंकर बताने लगा तालिबान की हिम्मत. वो सब गौर से देखने लगे और सुनने लगे. फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि तालिवाल क्या है? ये तो लगता है पाकिस्तान को खत्म कर देगा. लेकिन मैं उनको क्या समझाता कि मुट्ठी भर लोग कुछ नहीं कर सकते, लेकिन जो ताकत इनके पीछे काम कर रही है, उसका मकसद बस आतंक फैलाना है. मेरे पिता जी तो तालिबान को तालिवाल ही कहते हैं.सच बोलूं तो मेरे पिता जी और उसके साथी, तालिबान को इस तरह देखते है जैसे आज के बच्चे कार्टून नेटवर्क चैनल पर टॉम एंड जेरी को देखते हैं. जब घर से पिताजी बाहर होते हैं तो टीवी पर पंजाबी गीत सुनने को मिलते थे, जैसे मेरे पापा जी घर में प्रवेश करते तो सब टीवी छोड़कर भाग जाते और कहते आ गए तालिबान, तालिबान. मेरे घर के समीप एक घर बनाने का काम करने वाला मिस्त्री रहता है, जब तक वो शाम को मेरे पापा के पास आकर हमारे टैलीविजन पर तालिबान संबंधित खबरें न सुन ले, उसको शायद रोटी हजम नहीं आती, मेरी बहन भाभी चिल्लाते रहते हैं कि छोटी बहू देखनी है, राधिका वाला सीरियल देख लेने दो.अब रिमोट डैडी के हाथों में होता है तो बस खबरिया चैनल चलते हैं, पंजाबी न्यूज चैनल नहीं चलाते क्योंकि वो तो जब देखो तब बादल का गुनगाण करते रहते हैं. और इन चैनलों पर कैप्टन साहिब की फोटो तो तब ही आती है, जब कोई एंटी खबर प्रसारित हो रही होती है. इस लिए हिन्दी चैनलों पर जोर है, हिन्दी चैनल भी वो जो तालिबान की खबरें देता हो..ऐरा गैरा चैनल तो पसंद ही नहीं उनको. हिन्दी भी कम ही समझ आती होगी, मेरे पिता जी और अन्य लोगों को. लेकिन अगर तालिबान की स्टोरी इंग्लिश चैनल पर भी आती तो वो ठहर जाते हैं और सुनते हैं,,,बेशक बाद कहें साली ये भाषा तो समझ में ही नहीं आती. एक महीने तक मैंने तालिबान की हर कड़ी देखी, मजबूरी में चाहे वो शरियत कानून लागू करने की हो, चाहे स्वात घाटी से निकलकर तालिबानी अजगर की पंजाब की तरफ रुख करने की हो या फिर अंतिम कड़ी बूनेर से तालिबान के वापिस जाने की. इसके अतिरिक्त कोड़े बरसने की. अन्य लोग (सुरजीत मिस्त्री, मोहना अंकल) और मेरे पिता जी के दरमियान जब बातें होती हैं, तालिबान की या फिर राजनीति की. इसमें कोई शक नहीं कि तालिबान को हिन्दुस्तान में खबरिया चैनलों ने हौआ बनाकर रख दिया. मैंने उनको कई बार समझाया कि तालिबान बस ऐसे है, जैसे पंजाब में कभी खालिस्तान नामक आतंकवाद ने सिर उठाया था. मगर खबरिया चैनलों ने उनके दिमाग में तालिबान की ऐसी शक्ल बना दी कि उनको लगता है कि पूरे विश्व पर तालिबान काबिज हो जाएगा. एक महीने तक मुझे तालिबान तालिबान शब्द ने पका दिया. अगर घर में कोई रिश्तेदार भी आता तो पापा जी उनको तालिबान की कहानी सुनाने बैठ जाते, कभी कभी तो नेताओं पर क्रोधित होकर कहते साले तालिबानी भारती नेताओं को क्यों नहीं मारते..मैंने उनको बताया कि भारत में भी तालिबान है बस उसका नाम नक्सलवाद है.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-461462910655762267?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/461462910655762267/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=461462910655762267&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/461462910655762267'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/461462910655762267'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/04/blog-post.html' title='मैं, मेरे पिता और तालिबान'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='29' src='http://4.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SaDJ0BN1poI/AAAAAAAAAEE/dWrRlgMdpd4/S220/blog+ke+liye.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-1325072298623493154</id><published>2009-03-19T11:02:00.002+05:30</published><updated>2010-01-19T00:31:44.840+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दोस्त'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>जब यारों के लिए लिखे प्रेम पत्र</title><content type='html'>वो दिन बहुत याद आते हैं, जब हम सब दोस्त मिलकर एक घर में एकत्र होते थे और पढ़ा करते थे, पढ़ने वाले तो दो ही थे, बाकी तो मौज मस्ती करने के लिए आते थे. शाम को रोटी खाने के बाद दूध पीकर घर से पढ़ाई का बहाना बनाकर जल्दी भागना मुझे याद है, हम सब मेरे एक दोस्त के यहां एकत्र होते थे, उनके बाहर वाले घर में जहां पर होती थी बस हमारी मनचलों की टोली. हंसना, बातें सुनाना और कभी कभार गंभीरता से पढ़ना हमारी रातचर्या में शामिल था.&lt;br /&gt;उस घर में पहले मैं और मेरा एक अन्य दोस्त पढ़ते थे, जो जट्ट सिख परिवार से संबंध रखता था, धीरे धीरे हमारे एक साथ पढ़ने के बात मेरे अन्य दोस्तों तक पहुंच गई, और उन्होंने भी वहां पर आना शुरू कर दिया. उनको घर से मंजूरी मेरे नाम के चलते मिल गई, क्योंकि मेरे दोस्तों के अभिभावक जानते थे कि हैप्पी ( लेकिन उनके अभिभावक मुझे पंडितों का लड़का कहकर ही संबोधन करते थे) पढ़ने लिखने में तेज है. सच कहता हूं, जब तक हम दो थे तो ठीक था, लेकिन जब हमारी संख्या बढ़ते बढ़ते पांच छ: हो गई, तब मौज मस्ती ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया. हम सबने 9वीं कक्षा अच्छे नंबरों से पास कर ली, नतीजियों ने मां-बाप का विश्वास बढ़ा दिया कि बच्चे एक साथ पढ़ते हैं तो अच्छे नंबर लेकर आते हैं, लेकिन वो हमारी मौज मस्ती से अनजान थे.&lt;br /&gt;दसवीं कक्षा में होते ही, एकदम से सब को प्रेम का कीड़ा काटना शुरू हो गया, एक लड़की हमारे स्कूल में एक शहर से आई थी, जो बहुत ज्यादा शहरी किस्म की थी, वो जिस शहर से आई थी, वहां ज्यादातर लोग पढ़े लिखे थे, ज्यादा शहरी थे. लेकिन अब वो गांव में आ गई थी, मगर वारिस शाह के कहने अनुसार आदतें कभी नहीं जाती, आदमी मर जाता है, उस लड़की ने आते ही कक्षा में लड़कों से दोस्ती रखने के परंपरा शुरू की, उसने अपने ढंग से सब लड़कियों के दिल की बात जानने के लिए वोटिंग रख दी, वो देखना चाहती थी कि कौन सी लड़की किस लड़के को पसंद करती है. लड़कियों में ऐसा हुआ है, ये बात मेरे दोस्त की गर्लफ्रैंड के मार्फत हम तक पहुंच गई, जो कई लड़कों की गर्लफ्रैंड रह चुकी थी.&lt;br /&gt;शहरी लड़की के पीछे सब दीवाने थे, मुझे छोड़कर, सच है,, कसम से बिल्कुल सच, क्योंकि वो उस तरह की लड़की नहीं थी, जो मुझे पसंद आए या मेरी रातों की नींद चुरा ले. अब उसको पटाने के लिए लड़कों में होड़ सी लगी थी, सब एक दूसरे से सुंदर बनाकर आने लगे, ऐसे में हम सब दोस्तों ने मिलकर एक लड़के को कहा कि वो उससे प्यार करती है, पहले तो उसको यकीन नहीं हुआ, लेकिन एक दिन आधी छुट्टी वाले दिन किसी काम से वो लड़की उस लड़के के पास आई. बस फिर क्या था, हमने उसको अहसास करवाया कि वो उससे प्यार करती है, लेकिन मुझे पता था कि वो किसी और लड़के को पसंद करती है, क्योंकि उस लड़के के दोस्त मेरे साथ कबड्डी खेलते थे.&lt;br /&gt;अब उस महोदय को बात सच लगने लगी, उसने कहा हैप्पी तुम मेरे दोस्त हो, मैंने बेशक, तो उसने कहा के मेरे लिए एक प्रेम पत्र लिखो, मैं उसको देना चाहता हूं. जैसा तैसा आता था, मैंने लिखकर उसको थमा दिया. लेकिन वो तीन दिन तक जेब में पाकर इधर उधर घूमता रहा, एक दिन मैंने कहा, चल यार मैं ही तेरी बात करवा देता हूं, क्योंकि लड़कियों में मेरी इमेज कुछ अच्छी थी, क्योंकि मैं एक दो प्यार प्रस्ताव ठुकरा चुका था. एक तो नौवीं कक्षा में और एक इन पलों से कुछ दिन पहले, मैंने आधी छुट्टी के वक्त उसको बुलाया, वो मेरे पास आई, तो मैंने कहा ये आपसे कुछ बात कहना चाहता है, वो बिंदास बोली बोलो (उसका नाम लेकर)...वो बेचारा पसीनों पसीनी हो गया, और बोला कुछ नहीं, वो ऐसे ही मेरी तरफ देखकर चली गई. उसके बाद मेरे दो और दोस्तों ने रात को प्रेम पत्र लिखवाए, एक महोदय का प्रेम पत्र तो कपड़ों की धुलाई के साथ ही धुल गया.&lt;br /&gt;दरअसल, उसने मुझे प्रेम पत्र लिखाकर अपनी पेंट में डाल दिया, ताकि मौका मिलते ही उसको थमा देगा, लेकिन गांव में प्यार का शब्द कहते ही जुबां होंठ एवं पूरा शरीर थर्राता है, तो प्रेम पत्र कोई कैसे ऐसे पकड़ा देता..कुछ दिन वो प्रेम पत्र लेकर जेब में घूमता रहा और एक दिन पेंट में घर भूल गया और मां ने कपड़ों के साथ उसको धो दिया. इसके अलावा अन्य दोस्तों के लिए भी मैंने प्रेम पत्र लिखे, लेकिन किसी में दम नहीं था कि वो आगे पहुंचा सके, और मैं खुद के लिए लिखता नहीं था, क्योंकि घर की स्थिति और बापू की लठ अक्सर मुझे रोक देती थी. वैसे दिल लुटाने वालों की कमी न थी. आगे बताऊंगा...तब तक के लिए अलविदा...&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-1325072298623493154?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/1325072298623493154/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=1325072298623493154&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1325072298623493154'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/1325072298623493154'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/03/blog-post_4946.html' title='जब यारों के लिए लिखे प्रेम पत्र'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='29' src='http://4.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SaDJ0BN1poI/AAAAAAAAAEE/dWrRlgMdpd4/S220/blog+ke+liye.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-6610557748342369699</id><published>2009-03-14T16:10:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:26:35.787+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>मेरे गांव का 'निराला बीच'</title><content type='html'>गोवा के बीच कैसे हैं या फिर पांडुचेरी के समीप बना खास विदेशियों के लिए एक बीच कैसा है. मैं नहीं जानता, क्योंकि कभी जाने का मौका ही नहीं मिला. इन बीचों के बारे में सुनने को अक्सर मिल जाता है क्योंकि इन बीचों पर विदेशी महिला पर्यटकों के साथ सामूहिक बलात्कार की खबरें, जो आती जाती रहती हैं. और बीचों पर पैसे खर्च कर कैसा आनंद मिलता है, वो पता नहीं. लेकिन हां, एक बीच मुझे पता है, जो गर्मियों में अक्सर भरा मिलता था. जो किसी भी जात धर्म नसल के लिए वर्जित नहीं. जहां पर सब नसल के लोग आते हैं, हर वर्ग, हर उम्र के. कभी कभी तो बाप बेटे एक साथ भी मौज मस्ती करते हुए मिल जाते थे. आप सोच रहे होंगे, ऐसा कौन सा बीच है. है मेरे दोस्त, मेरे गांव का बीच. मुझे लगता है कि ज्यादातर गांव में मेरे गांव जैसे बीच आम मिल जाएंगे. बस नजरिए की बात है. मेरे गांव के बस अड्डे से करीबन आधा किलोमीटर दूर एवं मेरे खेतों के बिल्कुल साथ से एक नहर बहती है, जो करीबन 15 फुट गहरी है, जिसका पानी आसमानी रंग का दिखता है. इसके साथ कच्चे रास्ते हैं, जो खेतों को मुख्य सड़क से जोड़ते हैं. इन कच्चों रास्तों से हर रोज दर्जनों ट्रैकटर ट्रालियां बैल गाड़ियां गुजरती हैं. वाहनों के आवागामन से इन कच्चे रास्तों की मिट्टी डरमीकूल से भी ज्यादा मुलायम हो जाती है, एक दम पाउडर के माफिक. जब सूर्यदेव जून जुलाई में जोरों की गर्मी बरसा रहा होता है एवं पसीना पूरे शरीर को ऐसे तर-ब-तर कर देता है, जैसे नए सीमेंट के बने मकान को व्यक्ति पानी छिड़क कर तर-ब-तर करता है. ऐसे मन को राहत देने लिए गांववासियों को पेड़ों की ठंडी छाया के बाद नहर याद आती है. जिसके शीतल जल में डुबकी लगाकर ठंड का अहसास होता है एवं गर्मी से निजात मिलती है. नहर का पानी गर्मियों में भी इतना ठंडा होता है कि एक घंटा नहाने के बाद आपको ठंड लगने लग जाएगी. शरीर में ठंडे पानी के चलते घुस गई ठंड को मारने के लिए भट्ठी पर रखे दानों की तरह तिलमिला रही कच्चे रास्तों की पाउडर सी मुलायम मिट्टी पर बिंदास लोटना, सच में बहुत आनंदमयी होता है. कुछ देर इन रास्तों की पाउडर सी मुलायम मिट्टी पर लोटना और फिर दौड़ते दौड़ते नहर के ठंडे पानी में कूद जाना. इस दौरान जो आनंद आता है, शायद वो आनंद किसी और बीच पर तो न आएगा. कोई फालतू का खर्च नहीं, बस मौजां ही मौजां..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-6610557748342369699?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/6610557748342369699/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=6610557748342369699&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/6610557748342369699'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/6610557748342369699'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/03/blog-post_14.html' title='मेरे गांव का &apos;निराला बीच&apos;'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='29' src='http://4.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SaDJ0BN1poI/AAAAAAAAAEE/dWrRlgMdpd4/S220/blog+ke+liye.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-948328782159423285</id><published>2009-03-08T12:28:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:32:05.420+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रतिया'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='होली'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='इंदौर'/><title type='text'>बस याद है एक होली...</title><content type='html'>हरियाणा के रतिया शहर की बात है....जब घर में से रंग उठाकर मजाक मजाक में अपनी भाभी पर डाल दिया, जिसकी उम्र समय समय करीबन 27 की होगी, और मेरी करीबन दस ग्यारह की. उसके बाद करीबन सुबह ग्यारह बजे से शाम चार बजे तक वो मुझ पर रंग गिराती रही, क्योंकि उनकी होली के चलते पूरी तैयारी थी. इस दिन भाभी देवर एक दूसरे पर रंगों की इस तरह बौछार करते हैं, जैसे सरहद पर खड़े नौजवान युद्ध के समय एक दूसरे पर गोलियां की, पर फर्क इतना वहां देश की सुरक्षा को लेकर उनके मन जज्बा होता है, लेकिन यहां पर मन में त्यौहार की खुशी, उल्लास होता है. उस दिन शाम चार बजे रंग फेंकने पर विराम लगाकर मैंने नल के नीचे स्नान किया. इस होली के सिवाए शायद मुझे कोई भी होली याद नहीं, पिछले दो साल तो वेबदुनिया में ही गुजर गए, पता ही नहीं चलता कब गुलाल हवा में उड़कर मिट्टी पर गिरकर मिट्टी को अपने रंग में रंग लेता है. इससे पहले की करीबन पांच होलियां घर से निकलकर रंगों से बचते बचाते ऑफिस जाने में निकल गईं. इससे पहले में गांव में था, वहां होली से बचना बहुत जरूरी होता था, क्योंकि वहां होली रंगों से नहीं बल्कि इंजन से निकले काले तेल, तवे की कालस, गोबर के पानी घोल से, गलाल तो कहीं कहीं समझदार बुजुर्ग लोगों के हाथों में नजर आता था. उक्त चीजों के बरसे के भी कारण थे, कि जैसे को तैसा...इतने खतरनाक रंग होने के बावजूद भी होली के दिन पूरे गांव में उल्लास रहता था, पिचकरी तो कोई इस्तेमाल नहीं करता था, सब छतों से पानी की बाल्टियां गिराते थे. वो दिन निकल गए, जिन्दगी कामों में उलझकर त्यौहारों से दूर हो गई. इस बार तो इंदौर शहर के हर चौराहे, मोड़ पर अखबारों पर एक लाइन लिखी मिलती है, रंगों से नहीं इस बार खेलो तिलक होली..तिलक लगाने से होली का वो मजा तो नहीं आता, जो रंग बरसाने से आता है, एक दूसरे के चेहरे पर गुलाल लगाने से आता है. जब तक रंगों में भीगे नहीं तो होली का क्या मजा ? जैसे दीवाली पर पटाखों की आवाज कम होती जा रही है, शायद अब होली भी केवल एक माथे पर टीका लगाने तक सीमत होकर रह जाएगी. आने वाले सालों में पैदा होने वाले बच्चे जब अमिताभ की आवाज में रेखा और अमित पर फिल्माए गए 'रंग बरसे, भीगे चुनरवा' गीत को देखेंगे तो अपने अभिभावकों से जरूर पूछेंगे कि होली इस तरह की होती थी या जो आज मनाई जा रही है इस तरह की ?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-948328782159423285?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/948328782159423285/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=948328782159423285&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/948328782159423285'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/948328782159423285'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='बस याद है एक होली...'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='29' src='http://4.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SaDJ0BN1poI/AAAAAAAAAEE/dWrRlgMdpd4/S220/blog+ke+liye.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-7739495493823911787</id><published>2009-02-22T15:34:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:26:05.747+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>आखिर मिला ग्रीन सिग्नल</title><content type='html'>शनिवार की रात को करीबन पौने दस बजे उसकी (मेरी पत्नी) बस गंगवाल बस स्टैंड से रवाना होनी थी और वो शादी के खुलासे के बाद पहली बार अपने घर जा रही थी, क्योंकि कुछ दिन पहले मेरे ससुर जी का फोन आया था और बोले थे कि घर में हवन रखा है, अगर तुम आओ तो अच्छा है, ऐसा अपनी बेटी से कहा उन्होंने. इसके साथ उन्होंने ये भी कहा क्या हैप्पी आने देगा, तो उसने फटाक से कहा कि वो तो बहुत बार कह चुका है, लेकिन मेरा मन नहीं कर रहा था क्योंकि कहीं आप मेरे आने से गुस्से न हो जाएं. उन्होंने कहा कि फिलहाल मैं मुम्बई में हूं और रविवार को तुमसे पहले घर पहुंच जाउंगा. शनिवार को वो घर के लिए रवाना हुई, लेकिन बस कमबख्त एक घंटे की देरी से चली, जिसके चलते हमको फिर घर वापस आना पड़ा. एक घंटे बाद हम फिर बस स्टैंड गए और बस आ गई थी, वो हंसते हंसते घर के लिए रवाना हो गई. सच पूछो तो घर वापसी किसे नहीं अच्छी लगती और खासकर उसको जिसने नौ माह से अपने घर के दर्शन न किए हों, जिसमें उसने बचपन गुजारा हो, जहां मां पिता की डांट सुनी और उनके प्यार के पालने में झूटे लिए हों. जिस घर में भाईयों और बहनों के साथ मस्ती में हंसते खेलते दिन गुजारे हों. रविवार की सुबह साढ़े नौ बजे के आस पास उसका फोन आया और बोली. बस कुछ मिनटों बाद मैं घर में प्रवेश कर जाऊंगी और तुम फोन मत करना क्योंकि घर में पूजा चल रही है, और मुझे जल्दी से तैयार होना है. मैंने कहा ठीक है बाबा, मैं कबाब में हड्डी क्यों बनूं, नौ महीनों बाद एक बेटी अपने माता पिता से मिलने जा रही हैं. मुझे इंतजार था कि वो घर पहुंचने बाद भी मौका पाकर फोन करे, सो उसने किया और कुछ की खबर सुनाई कि पिता के साथ साथ मां ने भी आशीर्वाद दे दिया. उसका फोन आने से पहले स्थिति पीली बत्ती की तरह थी, पता नहीं था कि इसके बाद बत्ती हरी हो गई या लाल. बस इंतजार था, अगले इशारे का. अब मां का आशीर्वाद मिल गया. मानो तो फिल्म सेंसर बोर्ड से पास हो गई, लेकिन देखना है कि विरोध करने वाले तो नहीं प्रभावित करेंगे.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-7739495493823911787?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/7739495493823911787/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=7739495493823911787&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7739495493823911787'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/7739495493823911787'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/02/blog-post_22.html' title='आखिर मिला ग्रीन सिग्नल'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='29' src='http://4.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SaDJ0BN1poI/AAAAAAAAAEE/dWrRlgMdpd4/S220/blog+ke+liye.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-4416638576254596654</id><published>2009-02-19T08:53:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:25:12.320+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>....वो खुशी खुशी लौट आए</title><content type='html'>आज बुधवार का दिन है, और चिंता की चादर ने मुझे इस कदर ढक लिया है, जैसे सर्दी के दिनों में धूप को कोहरा, क्योंकि आते शनिवार को मेरी पत्नी शादी के बाद पहली बार मायके जा रही है, और वादा है अगले बुधवार को लौटने का. तब तक मेरा इस चिंता की चादर से बाहर आना मुश्किल है. मुझे याद है, जब वो आज से एक साल पहले शादी करने के बाद अपने मायके गई थी, लेकिन आज और उस दिन में एक अंतर है, वो ये कि तब हमने अपनी शादी से पर्दा नहीं उठाया था, और घरवालों की नजर में वो विवाहित नहीं थी. हां, मगर उसके घरवाले ये अच्छी तरह जानते थे कि इंदौर में उसका मेरे साथ लव चल रहा है. वो इंदौर से खुशी खुशी अपनी सहेली की शादी देखने के लिए दिल में लाखों अरमान लेकर निकली, लेकिन जैसे ही वहां पहुंची तो अरमानों पर गटर का गंदा पानी फिर गया. वो एक रात की यात्रा करने के बाद थकी हुई थी और थकावट उतारने के लिए उसने स्नान किया. अभी वो पूरी तरह यात्रा की थकावट से मुक्त नहीं हुई थी कि अचानक उसके सामने एक अजनबी नौजवान खड़ा आकर खड़ा हो गया, जो उसके मम्मी पापा ने उसको देखने के लिए बुलाया था. और जैसे ही उसको पता चला कि वो नौजवान उसको देखने के लिए आया है. वो लाल पीली हो गई, शायद उसी तरह जो उसका रूप मैं भी कभी कभी देखता हूं, उसने उस नौजवान को कहा कि मुझे तुम्हारे बारे में नहीं बताया गया.इस घटनाक्रम के बाद युवक तो वहां से चला गया, लेकिन घर में गुस्सा नफरत और आंसू आ गए. घर का पूरा माहौल ही बदल गया, वो अपने ही घर में कैदी हो गई, अजनबी हो गई और अकेली हो गई. उसके इस तरह के स्पष्ट जवाब से परिवारों को इस कदर कष्ट पहुंचा है कि उसके मम्मी पापा ने उसने बात बंद कर दी. इतना ही नहीं उसको घर से बाहर जाने की भी आज्ञा नहीं थी, जैसे हिन्दी फिल्मों में आम होता है. वो अपनी उस सहेली की शादी में भी नहीं जा पाती, जिसकी शादी में जाने लिए वो इंदौर से निकली थी. कुछ दिन उसने वहां रो-धोकर गुजारे, लेकिन पिता का दिल तो पिता का होता है, बेटी को तिल तिलकर मरते वो कैसे देखते. जिससे उन्होंने नाजों से पला था. उन्होंने बिटिया की जिद्द के आगे घुटने टेकते हुए उसको इंदौर आने के लिए आज्ञा दे दी और वादा किया कि वो उस लड़के से मिलने आएंगे, जिसको पसंद करती है यानी मुझे. जैसे ही वो जहां पहुंची तो मुझे पता लगा कि उसने पिता को सच नहीं बताया. फिर मैंने एक दिन साहस करते हुए मोबाइल किया और बोल दिया कि मैंने आपकी बेटी से शादी कर ली है. बेशक मेरा इस तरह उनको बताना किसी सदमे से कम न होगा. लेकिन मेरा बताना लाजमी था क्योंकि वो मुझसे मिलने के लिए आने वाले थे, ऐसे में लाजमी था कि वो सच्चाई से अवगत हों. उसके कुछ दिनों बाद वो इंदौर आए, हमारे बीच दो दिन तक तर्क वितर्क होते रहे, उन्होंने उसको को अपने साथ लेकर जाने का हरसंभव प्रयास किया, लेकिन वो अटल रही अपनी बात पर, अगर आप इसको अपनाते हो तो मैं चलती हूं, नहीं तो नहीं. वो रिश्ता तोड़कर चले गए, आखिर खून के रिश्ते कभी कहने से टूटे हैं जो टूटेंगे. आज एक साल बाद उन्होंने उसको को सामने से आने के लिए कहा है, उनकी बोलचाल में बदलाव है, लेकिन ऐसे में मन का डरना लाजमी है क्योंकि माता पिता को बेशक इस शादी से एतराज न हो, लेकिन समाज की नफरत का जहर कहीं हंसते बसते घर को बर्बाद न कर दे. फिलहाल दुआ करता हूं कि पिछली बार की तरह इस बार भी वो खुशी खुशी मेरे पास लौट आए, और हिन्दी फिल्मों की तरह इस प्रेम कहानी की भी हैप्पी एंडिंग हो..उसको इस लिए भेज रहा हूं, मुझे अपने ससुर पर भरोसा है, और खुद के प्यार पर, इसके अलावा मेरा मानना है कि डर से जितना जल्दी आमना सामना हो जाएं उतना अच्छा है।&lt;br /&gt;जब मुझे प्यार हुआ...&lt;br /&gt;&lt;a href="http://liveindia.mywebdunia.com/2008/08/02/1217653198185.html?"&gt;http://liveindia.mywebdunia.com/2008/08/02/1217653198185.html?&lt;/a&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-4416638576254596654?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/4416638576254596654/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=4416638576254596654&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4416638576254596654'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/4416638576254596654'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/02/blog-post_18.html' title='....वो खुशी खुशी लौट आए'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SP_-8-6FzEI/AAAAAAAAABs/WiT2rsHL6NE/S220/blogs.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-8375079512420603764</id><published>2009-02-17T17:53:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:25:31.566+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>...लड़का होकर डरता है</title><content type='html'>बात है आज से कुछ साल पहले की, जब मैं शौकिया तौर पर अपने एक बिजनसमैन दोस्त के साथ रात को मां चिंतपूर्णी का जागरण करने जाया करता था और आजीविका के लिए दैनिक जागरण में काम करता था। एक रात उसका फोन आया कि क्या हैप्पी आज जागरण के लिए जाना है? मैंने पूछा कहां पर है जागरण?, तो उसने कहा कि हरियाणा की डबवाली मंडी में है, जो भटिंडा शहर से कोई 20 30 किलोमीटर दूर है. मैंने आठ बजे तक सिटी के तीन पेज तैयार कर दिए थे, और एक पेज अन्य साथी बना रहा था. मैंने अपने ऑफिस इंचार्ज को बोला सर जी मैं जा रहा हूं. एक पेज रह गया वो बन रहा है. तो उन्होंने हंसते हुए कहा, क्या जोगिंदर काका के साथ जा रहा है, मैंने कहा हां जी. इतने में जोगिंदर ने हनुमान चौंक पहुंचते ही कॉल किया. मैं तुरंत ऑफिस से निकला और हनुमान चौंक पहुंचा, वहां से एक गाड़ी में बैठकर मैं डबवाली के लिए रवाना हुआ. पौने घंटे के भीतर हम सब जागरण स्थल पर पहुंच गए और वहां पर मां के भगत हमारा इंतजार कर रहे थे कि कब भजन मंडली वाले आएं और जागरण शुरू करें. लेकिन पहले पेट पूजा, फिर काम कोई दूजा. इस लिए हम सबसे पहले छत पर पहुंचे, जहां पर खाना सजा हुआ था. हमने पेट पूजा करने के बाद स्टेज संभाली. हर बार की तरह इस बार भी जोगिंदर काका ने जागरण का आगाज अपनी अपनी प्यारी प्यारी मनमोहनी बातों से की. और जागरण का श्रीगणेश किया. भगती रंग में रंगे हुए हमको पता ही नहीं चला कि कब सुबह के दो बज गए और दो बजे घरवालों ने प्रसाद एवं चाय बांटनी शुरू की. सब चाय एवं भुजिए बदाने का आनंद ले रहे थे, मैं पानी पीने के लिए अंदर गया तो एक लड़की ने कहा कि तुम्हारा फोन नंबर क्या है. मैं हैरत में पड़ गया, उसकी उम्र ब-मुश्किल 17 की होगी. गोल मटोल चेहरा बेहर प्यारी सूरत॥तो स्वाभिक था कि मैं उसको अपना मोबाइल नंबर देता. मैंने जोगिंदर से पैन लेकर एक कागज के टुकड़े पर नंबर लिखा एवं फिर अंदर गया और कागज का टुकड़ा उसकी तरफ फेंका. इसके बाद जो उसकी जुबां से बोल निकले..आज भी मुझे याद हैं..वो बोली लड़का होकर डरता है. उसके बाद आज तक न तो उसका फोन आया और नाहीं कभी मुलाकात हुई..उसके बाद एक बार उनके घर जाना हुआ था, तो वहां जोगिंदर ने बात निकाल ली, उसको पता था. तो वहां उपस्थित लड़की ने बोला..वो उसकी सलेही थी. जो आजकल कहीं दूसरे शहर में रहती हैं. लेकिन उस लड़की एक बात आज भी याद है वो है..लड़्का होकर डरता है..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-8375079512420603764?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/8375079512420603764/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=8375079512420603764&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8375079512420603764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/8375079512420603764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/02/blog-post_2346.html' title='...लड़का होकर डरता है'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SP_-8-6FzEI/AAAAAAAAABs/WiT2rsHL6NE/S220/blogs.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-874476774711219465</id><published>2009-02-17T17:52:00.002+05:30</published><updated>2010-01-19T00:25:50.284+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>..जब भागा दौड़ी में की शादी</title><content type='html'>&lt;b&gt;&lt;span style="color: #3366ff;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;आज से एक साल पहले, इस दिन मैंने भागा दौड़ी में शादी रचाई थी, अपनी प्रेमिका के साथ. सही और स्पष्ट शब्दों में कहें तो आज मेरी शादी के पहली वर्षगांठ है. आज भी मैं उस दिन की तरह दफ्तर में काम कर रहा हूं, जैसे आज से एक साल पहले जब शादी की थी, बस फर्क इतना है कि उस समय हमारा कार्यलय एमजी रोड स्थित कमल टॉवर में था, और आज महू नाका स्थित नईदुनिया समाचार पत्र की बिल्डिंग में है. आप सोच रहे होंगे कि भागा दौड़ी में शादी कैसे ? तो सुनो..शादी से कुछ महीने पहले मुझे भी हजारों नौजवानों की तरह एक लड़की से प्यार हो गया था और हर आशिक की तमन्ना होती है कि वो अपनी प्रेमिका से ही शादी रचाए और मैं भी कुछ इस तरह का सोचता था. लेकिन हमारी शादी को आप समारोह नहीं, बल्कि एक प्रायोजित घटनाक्रम का नाम दे सकते हैं. मुझे और मेरी जान को लग रहा था कि शादी के लिए घरवाले नहीं मानेंगे, इस लिए हम दोनों ने शादी करने का मन बनाया, क्योंकि कुछ दिनों बाद उसको घर जाना था, और उधर घरवाले भी ताक में थे कि अब बिटिया घर आए और शादी के बंधन में बांध दें.क्योंकि उनको मेरे और मेरी प्रेमकहानी के बारे में पता चल गया था. इसकी भनक हमको भी लग गई थी, इस लिए हम दोनों ने पहले कोर्ट से कागजात तैयार करवाए और फिर उनको आर्य मंदिर में देकर शादी की तारीख पक्की की. मेरा तो मन था कि शादी 14 तारीख को करें, लेकिन श्रीमति ने कहा कि नहीं मेरी सहेली ने कहा है 16 का महूर्त शुभ है. मैंने पूरा दिन आफिस में कोहलू के बैल की तरह काम किया और फिर भागा भागा घर गया. वहां से तैयार बयार होकर पैदल उसकी गली से होते हुए इंडस्ट्री बस स्टॉप पहुंचा, जहां से बस पकड़ी और ब-मुश्किल आर्य मंदिर पहुंचा. शायद मैं पहला दुल्हा हूंगा, जिसके बाराती भी देर से आए और दुल्हन भी ऑटो रिक्शा में आई. इस मौके पर एक बात दिलचस्प थी, वो ये थी कि हम सब अलग अलग धर्मों एवं राज्यों से थे. मैं पंजाबी, पत्नी गुजराती, यार पंजाबी, गुजराती, बंगाली, उड़िया, मध्यप्रदेशी आदि. हम सब हम उम्र थे, सब खुश थे, एक दो को छोड़कर, क्योंकि उनको मेरी तरह ये चोरी छुपे की शादी अच्छी नहीं लग रही थी. हमने शादी सिर्फ ये सोचकर की थी कि अगर घरवाले मान जाते हैं तो हम दोनों दूसरी बार शादी कर लेंगे, वरना हम कोर्ट के मार्फत जाकर प्यार को बचा लेंगे. लेकिन शादी के एक महीने बाद हमने शादी का खुलासा कर दिया और एक साथ रहने लग गए. मेरे घरवालों ने तो उसकी वक्त अपना लिया था, लेकिन मेरे सुसराल वालों ने कुछ हद तक तो अपना लिया, लेकिन सस्पेंस अभी भी कायम है...बाकी सब ठीक है. लड़ते झगड़ते, रूठते, मनाते प्यार करते एक साल पूरा कर लिया.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-874476774711219465?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/874476774711219465/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=874476774711219465&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/874476774711219465'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/874476774711219465'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/02/blog-post_17.html' title='..जब भागा दौड़ी में की शादी'/><author><name>कुलवंत हैप्पी</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SP_-8-6FzEI/AAAAAAAAABs/WiT2rsHL6NE/S220/blogs.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-612010085371553487.post-5964192093123666888</id><published>2009-02-15T09:26:00.001+05:30</published><updated>2010-01-19T00:33:31.839+05:30</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैं'/><title type='text'>वेलेंटाईन डे पर सरप्राइज गिफ्ट</title><content type='html'>शनिवार को वेलेंटाइनज डे था, हिन्दी में कहें तो प्यार को प्रकट करने का दिन. मुझे पता नहीं आप सब का ये दिन कैसा गुजरा,लेकिन दोस्तों मेरे लिए ये दिन एक यादगार बन गया. रात के दस साढ़े दस बजे होंगे, जब मैं और मेरी पत्नी बहार से खाना खाकर घर लौटे, उसने मजाक करते हुए कहा कि क्या बच्चा चाकलेट खाएगा, मैं भी मूड में था, हां हां क्यों नहीं, बच्चा चाकलेट खाएगा. वो फिर अपनी बात को दोहराते हुए बोली 'क्या बच्चा चाकलेट खाएगा ?', मैंने भी बच्चे की तरह मुस्कराते हुए शर्माते हुए सिर हिलाकर हां कहा, तो उसने अपना पर्स खोला और एक पैकेट मुझे थमा दिया, मैंने पैकेट पर जेमस लिखा पढ़ते ही बोला. क्या बात है जेमस वाले चाकलेट भी बनाने लग गए. मैंने उसको हिलाकर देखा तो उसमें से आवाज नहीं आई और मुझे लगा क्या पता जेमस वाले भी चाकलेट बनाने लग गए हों, मैंने जैसे ही खोला तो चाकलेट की तरह उसमें से कुछ मुलायम मुलायम सा कुछ निकला, पर वो चाकलेट नहीं था बल्कि नोकिया 7210 सुपरनोवा, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी. मुझे यकीन नहीं हो रहा था, लेकिन उसने कहा ये तुम्हारा गिफ्ट है, पर मुझे यकीन नहीं हो रहा था, फिर उसने मेरे हैरत से लबलब हुए चेहरे को देखते हुए कहा, हां, मैं आज दोपहर के वक्त लेकर आई थी, तभी तो आफिस आते आते दो घंटे लग गए थे, मैंने पूछा कितने का है, वो बोली 5600 का, फिर चुटकी लेते हुए बोली नहीं नहीं 5700 का, मैंने पूछा वो कैसे, वो बोली मोटर साइकिल को पुलिस की गाड़ी उठाकर ले गई थी, जिसका जुर्माना सौ रुपया भरना पड़ा, तो हुआ ना 5700..मैंने बोला हां-हां. वो बोली तुम को कैसा लगा, ये तोहफा पाकर. मुझे याद आ गई एक पुराने दिन की जब अचानक मौसी के लड़के ने कहा था, हैप्पी तुम्हारा लेख दैनिक जागरण के फिल्मी पेज पर लगा है, और मैं उस वक्त भैंस को चारा डाल रहा था, मैंने बोला भाई मजाक मत करो, मैंने ऐसा इस लिए कहा क्योंकि लेख प्रकाशित न होने से मैं पूरी तरह दुखी था, हर बार चापलूस लोगों का छप जाता था और मेरा नहीं. जब मैंने खुद अखबार खोलकर देखा तो मेरी खुशी का कोई टिकाना नहीं रहा, कारण था कि वो लेख मेरी उम्मीद खत्म होने पर लगा, क्योंकि उसको दो महीने हो गए थे जालंधर मुख्य दफ्तर में धूल फांकतेहुए. वो खुशी और पत्नी का सरप्रार्ज वेलेंटाईन गिफ्ट की खुशी एक जैसी थी. ये दिन मेरे सुनहरे दिनों में शुमार हो गया. और आपका वेलेंटाइन डे कैसे रहा जरूर लिखना दोस्तो...इंतजार रहेगा.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/612010085371553487-5964192093123666888?l=window84.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://window84.blogspot.com/feeds/5964192093123666888/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=612010085371553487&amp;postID=5964192093123666888&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/5964192093123666888'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/612010085371553487/posts/default/5964192093123666888'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://window84.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='वेलेंटाईन डे पर सरप्राइज गिफ्ट'/><author><name>युवा</name><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='31' height='27' src='http://2.bp.blogspot.com/_iDBVCRZjeXw/SP_-8-6FzEI/AAAAAAAAABs/WiT2rsHL6NE/S220/blogs.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry></feed>
