Sunday, March 08, 2009
बस याद है एक होली...
हरियाणा के रतिया शहर की बात है....जब घर में से रंग उठाकर मजाक मजाक में अपनी भाभी पर डाल दिया, जिसकी उम्र समय समय करीबन 27 की होगी, और मेरी करीबन दस ग्यारह की. उसके बाद करीबन सुबह ग्यारह बजे से शाम चार बजे तक वो मुझ पर रंग गिराती रही, क्योंकि उनकी होली के चलते पूरी तैयारी थी. इस दिन भाभी देवर एक दूसरे पर रंगों की इस तरह बौछार करते हैं, जैसे सरहद पर खड़े नौजवान युद्ध के समय एक दूसरे पर गोलियां की, पर फर्क इतना वहां देश की सुरक्षा को लेकर उनके मन जज्बा होता है, लेकिन यहां पर मन में त्यौहार की खुशी, उल्लास होता है. उस दिन शाम चार बजे रंग फेंकने पर विराम लगाकर मैंने नल के नीचे स्नान किया. इस होली के सिवाए शायद मुझे कोई भी होली याद नहीं, पिछले दो साल तो वेबदुनिया में ही गुजर गए, पता ही नहीं चलता कब गुलाल हवा में उड़कर मिट्टी पर गिरकर मिट्टी को अपने रंग में रंग लेता है. इससे पहले की करीबन पांच होलियां घर से निकलकर रंगों से बचते बचाते ऑफिस जाने में निकल गईं. इससे पहले में गांव में था, वहां होली से बचना बहुत जरूरी होता था, क्योंकि वहां होली रंगों से नहीं बल्कि इंजन से निकले काले तेल, तवे की कालस, गोबर के पानी घोल से, गलाल तो कहीं कहीं समझदार बुजुर्ग लोगों के हाथों में नजर आता था. उक्त चीजों के बरसे के भी कारण थे, कि जैसे को तैसा...इतने खतरनाक रंग होने के बावजूद भी होली के दिन पूरे गांव में उल्लास रहता था, पिचकरी तो कोई इस्तेमाल नहीं करता था, सब छतों से पानी की बाल्टियां गिराते थे. वो दिन निकल गए, जिन्दगी कामों में उलझकर त्यौहारों से दूर हो गई. इस बार तो इंदौर शहर के हर चौराहे, मोड़ पर अखबारों पर एक लाइन लिखी मिलती है, रंगों से नहीं इस बार खेलो तिलक होली..तिलक लगाने से होली का वो मजा तो नहीं आता, जो रंग बरसाने से आता है, एक दूसरे के चेहरे पर गुलाल लगाने से आता है. जब तक रंगों में भीगे नहीं तो होली का क्या मजा ? जैसे दीवाली पर पटाखों की आवाज कम होती जा रही है, शायद अब होली भी केवल एक माथे पर टीका लगाने तक सीमत होकर रह जाएगी. आने वाले सालों में पैदा होने वाले बच्चे जब अमिताभ की आवाज में रेखा और अमित पर फिल्माए गए 'रंग बरसे, भीगे चुनरवा' गीत को देखेंगे तो अपने अभिभावकों से जरूर पूछेंगे कि होली इस तरह की होती थी या जो आज मनाई जा रही है इस तरह की ?
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3 comments:
गाँव के गोबर, कीचड वाली होली में जो आनंद है वह शहर के हर्बल गुलाल में कहा.
शुद्ध घी में बनी गुझियों के नो कैलोरी मिठाइयों से क्या तुलना
समयचक्र: रंगीन चिठ्ठी चर्चा : सिर्फ होली के सन्दर्भ में तरह तरह की रंगीन गुलाल से भरपूर चिठ्ठे#links#links#links
remember and continue writings..
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